इस्लामाबाद | पाकिस्तान की संसद में बुधवार को उस समय हड़कंप मच गया, जब देश के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने अमेरिका-पाकिस्तान रिश्तों को लेकर ऐसा बयान दे दिया, जिसने न सिर्फ पाकिस्तान की विदेश नीति पर सवाल खड़े कर दिए, बल्कि दशकों पुराने रणनीतिक गठबंधन की असलियत भी उजागर कर दी।
ख्वाजा आसिफ ने संसद में खुलकर कहा कि अमेरिका ने अपने फायदे के लिए पाकिस्तान का इस्तेमाल किया और काम निकलते ही उसे “टॉयलेट पेपर की तरह फेंक दिया।” उन्होंने कहा कि अमेरिका के साथ खड़े होने की जो कीमत पाकिस्तान ने चुकाई, वह आज भी देश को आतंकवाद, अस्थिरता और सामाजिक टूटन के रूप में झेलनी पड़ रही है।
🗣️ “दो जंग लड़ीं, लेकिन फायदा किसी और का हुआ”
रक्षा मंत्री ने अपने भाषण में स्वीकार किया कि पाकिस्तान ने अफगानिस्तान में दो बड़ी जंगों में हिस्सा लिया, जिन्हें इस्लाम और मजहब के नाम पर जनता को समझाया गया, लेकिन असल सच्चाई कुछ और थी।
ख्वाजा आसिफ ने कहा—
“अफगानिस्तान की इन जंगों में हिस्सा लेना पाकिस्तान की नहीं, बल्कि दो सैन्य तानाशाहों—जनरल जिया-उल-हक और जनरल परवेज मुशर्रफ—की रणनीति थी, जिन्होंने वैश्विक ताकतों का समर्थन पाने के लिए देश को युद्ध में झोंक दिया।”
उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि इन फैसलों का खामियाजा आम पाकिस्तानी नागरिक आज भी भुगत रहे हैं।
🌍 1979 का जिक्र: अमेरिका ने बनाया अपना नरेटिव
ख्वाजा आसिफ ने 1979 में अफगानिस्तान में सोवियत संघ के हस्तक्षेप का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि—
- सोवियत संघ ने अफगान सरकार के आमंत्रण पर हस्तक्षेप किया था
- लेकिन अमेरिका ने इसे आक्रमण बताकर वैश्विक स्तर पर अपना नरेटिव तैयार किया
- उसी नरेटिव के तहत पाकिस्तान को मोहरे की तरह इस्तेमाल किया गया
आसिफ के मुताबिक, उस दौर में पाकिस्तान ने बिना दीर्घकालिक परिणामों पर सोचे अमेरिका का साथ दिया, जिसकी कीमत आज तक चुकानी पड़ रही है।
🇺🇸 9/11 के बाद अमेरिका के साथ खड़े होने की भारी कीमत
पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ने 11 सितंबर 2001 के आतंकी हमलों के बाद अमेरिका के साथ बनाई गई नई रणनीतिक साझेदारी पर भी सवाल उठाए।
उन्होंने कहा—
“9/11 के बाद अमेरिका के साथ खड़े होने का फैसला पाकिस्तान के लिए विनाशकारी साबित हुआ। आज जो आतंकवाद, अस्थिरता और सामाजिक बिखराव हम देख रहे हैं, वह उसी फैसले की देन है।”
आसिफ ने माना कि उस दौर में पाकिस्तान ने इतिहास से कोई सबक नहीं लिया।
🔄 “कभी अमेरिका, कभी रूस, कभी ब्रिटेन”
ख्वाजा आसिफ ने कहा कि पाकिस्तान ने हमेशा छोटे फायदे के लिए बड़ी शक्तियों के साथ अपने झुकाव बदले—
- कभी अमेरिका
- कभी रूस
- कभी ब्रिटेन
उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि आज इन देशों का पाकिस्तान की राजनीति और नीतियों में जो प्रभाव है, वह 30–40 साल पहले नहीं था।
💣 आतंकवाद पर खुली स्वीकारोक्ति
अपने भाषण में रक्षा मंत्री ने पाकिस्तान के आतंकी इतिहास को भी खुले तौर पर स्वीकार किया।
आसिफ ने कहा—
“अफगानिस्तान की जंगों में शामिल होना हमारी सबसे बड़ी भूल थी। आज देश में जो आतंकवाद है, वह उन्हीं गलत नीतियों और फैसलों का नतीजा है।”
उन्होंने माना कि पाकिस्तान को जो नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई कभी नहीं हो सकती।
📚 जंग को जायज ठहराने के लिए बदला गया एजुकेशन सिस्टम
ख्वाजा आसिफ ने एक और चौंकाने वाला दावा करते हुए कहा कि—
- जंगों को सही ठहराने के लिए
- पाकिस्तान के एजुकेशन सिस्टम में जानबूझकर बदलाव किए गए
- यह बदलाव आज भी शिक्षा व्यवस्था में मौजूद हैं
उन्होंने कहा कि पाकिस्तान अपनी गलतियों को स्वीकार करने से हमेशा बचता रहा, जिसकी वजह से समस्याएं और गहरी होती गईं।
✈️ बिल क्लिंटन के दौरे का उदाहरण
आसिफ ने साल 2000 में अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के इस्लामाबाद दौरे का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा—
- क्लिंटन भारत दौरे के बाद कुछ घंटों के लिए पाकिस्तान आए
- इससे साफ हो गया कि अमेरिका-पाकिस्तान रिश्ता केवल “जरूरत तक” सीमित था
उस समय पाकिस्तान में कोई निर्वाचित प्रधानमंत्री नहीं था और देश पर जनरल परवेज मुशर्रफ का सैन्य शासन था।
🕌 शिया मस्जिद हमले की निंदा
यह बयान ऐसे समय आया है, जब पाकिस्तान की संसद ने इस्लामाबाद की शिया मस्जिद में हुए आत्मघाती हमले की निंदा का प्रस्ताव पास किया।
- 6 फरवरी को जुमे की नमाज के दौरान हमला
- 31 लोगों की मौत, 169 घायल
- जिम्मेदारी इस्लामिक स्टेट (IS) ने ली
आसिफ ने राजनीतिक एकता की अपील करते हुए कहा कि आतंकवाद जैसे मुद्दों पर भी देश में एकजुटता की कमी है।
🇺🇸 अमेरिका का रुख: भारत की कीमत पर नहीं
इस बीच अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के हालिया बयान का भी जिक्र हुआ, जिसमें उन्होंने कहा था—
“अमेरिका पाकिस्तान से रिश्ते मजबूत करना चाहता है, लेकिन भारत की कीमत पर नहीं।”
रुबियो ने साफ किया कि भारत-अमेरिका संबंधों पर पाकिस्तान के साथ दोस्ती का कोई असर नहीं पड़ेगा।
✅ निष्कर्ष
ख्वाजा आसिफ का यह बयान केवल अमेरिका पर हमला नहीं है, बल्कि यह पाकिस्तान की दशकों पुरानी विदेश नीति और सैन्य फैसलों की खुली स्वीकारोक्ति भी है। अफगान जंग, आतंकवाद और वैश्विक शक्तियों पर निर्भरता—इन सबने मिलकर पाकिस्तान को आज जिस हालात में पहुंचाया है, उसकी झलक इस भाषण में साफ दिखाई देती है।
यह बयान आने वाले समय में न सिर्फ पाकिस्तान-अमेरिका रिश्तों पर असर डाल सकता है, बल्कि देश के भीतर भी नई राजनीतिक बहस को जन्म दे सकता है।


