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बांग्लादेश: हिंदू अस्तित्व पर मंडराता संकट और भारत-विरोधी भू-राजनीति का योजनाबद्ध अड्डा

हिंदुओं के विरुद्ध सुनियोजित हिंसा, जनसांख्यिकीय बदलाव और भारत को अस्थिर करने की एक सदी पुरानी रणनीति का विश्लेषण

बांग्लादेश: में मौजूदा हालात को यदि केवल “अल्पसंख्यकों पर हिंसा” या “आंतरिक राजनीतिक अस्थिरता” कहकर समझा जाए, तो यह एक गंभीर रणनीतिक भूल होगी। वास्तव में, यह संकट हिंदू अस्तित्व को क्रमिक रूप से समाप्त करने और भारत-विरोधी भू-राजनीतिक सोच को संस्थागत रूप देने की एक दीर्घकालिक, सुनियोजित प्रक्रिया का परिणाम है, जिसकी जड़ें एक सदी से भी अधिक पुरानी हैं।

इस पूरी प्रक्रिया की नींव वर्ष 1905 में रखी गई, जब ब्रिटिश वायसराय लॉर्ड कर्ज़न ने बंगाल का विभाजन किया। इसे प्रशासनिक सुविधा का नाम दिया गया, किंतु वास्तविक उद्देश्य हिंदू-मुस्लिम विभाजन को स्थायी बनाना था। यहीं से “डिवाइड एंड रूल” की वह रेखा खिंची, जिसने आगे चलकर भारत-विरोधी भूगोल और वैचारिक संरचना को जन्म दिया। यह मानना भोलेपन के अलावा कुछ नहीं कि यह केवल प्रशासनिक प्रयोग था; ब्रिटिश नीति ने जानबूझकर धर्म-आधारित राजनीति को बढ़ावा दिया, ताकि भविष्य में भारत के लिए रणनीतिक सिरदर्द बनने वाला क्षेत्र तैयार किया जा सके।

1947 में देश के विभाजन के साथ इस मानसिकता को निर्णायक रूप दे दिया गया। पूर्वी बंगाल को पाकिस्तान में शामिल किया गया, जबकि वहाँ लगभग 25 प्रतिशत हिंदू आबादी मौजूद थी। इसके बाद सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि हिंदुओं के विरुद्ध सुनियोजित उत्पीड़न का दौर शुरू हुआ। भेदभावपूर्ण भूमि कानून, साम्प्रदायिक दंगे, प्रशासनिक उपेक्षा और जबरन धर्मांतरण के माध्यम से हिंदुओं को या तो मार दिया गया, या भारत की ओर पलायन के लिए मजबूर किया गया। यही कारण है कि 1971 तक हिंदू आबादी घटकर लगभग 14 प्रतिशत रह गई।

1971 में भारत के निर्णायक सैन्य हस्तक्षेप से बांग्लादेश का जन्म हुआ और उसे औपचारिक रूप से धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र घोषित किया गया। किंतु इसके बावजूद वही भूगोल बनाए रखा गया, जो भारत को रणनीतिक रूप से कमजोर करता है। भारत के उत्तर-पूर्वी सात राज्यों को शेष भारत से जोड़ने के लिए केवल 21–22 किलोमीटर चौड़ा सिलीगुड़ी गलियारा छोड़ा गया, जिसे ‘चिकन नेक’ कहा जाता है। इसके ठीक पास स्थित चित्तागोंग हिल ट्रैक्ट्स—जो समुद्र से मात्र लगभग 18 किलोमीटर दूर है—को भारत में शामिल नहीं किया गया। साथ ही सिलीगुड़ी के आसपास के कई हिंदू-बहुल क्षेत्र भी भारत से अलग रखे गए। यह संयोग नहीं, बल्कि भारत के उत्तर-पूर्व को स्थायी रूप से असुरक्षित रखने की सुनियोजित रणनीति थी।

इसी व्यापक योजना का विस्तार भारत के अन्य सीमावर्ती क्षेत्रों में भी दिखता है। कश्मीर में एनजे-9842 के आगे सीमा अधूरी छोड़ी गई, जिससे सियाचिन विवाद उत्पन्न हुआ। पंजाब में सिख धर्म के पवित्र स्थल पाकिस्तान में चले गए, जम्मू-कश्मीर में माता शारदा पीठ भारत से अलग रह गई। भारत और तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान के भीतर सैकड़ों एन्क्लेव छोड़े गए, जिससे दशकों तक प्रशासनिक अराजकता बनी रही। रण ऑफ कच्छ में सीमा को जानबूझकर अस्पष्ट रखा गया। इन सभी निर्णयों का संयुक्त प्रभाव यही था कि भारत को विवादों और अस्थिरता से घिरा भूगोल विरासत में मिले।

पाकिस्तान काल में पूर्वी पाकिस्तान भारत-विरोधी उग्रवाद का लॉन्च-पैड बन गया। असम, नागालैंड और मिजोरम में सक्रिय उग्रवादी संगठनों को यहीं से प्रशिक्षण, हथियार और सुरक्षित पनाह मिली। चीन और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसियों के सहयोग से पूर्वी भारत को अस्थिर करने की योजनाएँ बनीं। 1971 के बाद ये गतिविधियाँ कुछ समय के लिए रुकीं, लेकिन भारत-विरोधी सोच समाप्त नहीं हुई—वह केवल नए रूपों में सामने आती रही।

बांग्लादेश बनने के बाद भारत-बांग्लादेश सीमा को दुनिया की सबसे जटिल सीमाओं में से एक बना दिया गया। नदियों, दलदलों और घनी आबादी से होकर गुजरने वाली यह सीमा घुसपैठ के लिए स्वाभाविक रूप से अनुकूल रही। 1990 के दशक में कट्टरपंथी राजनीति के उभार के साथ यह सीमा भारत-विरोधी गतिविधियों का केंद्र बन गई। इसी दौरान उग्रवादी संगठनों के शिविर, हथियार और ड्रग्स की तस्करी, मानव तस्करी और संगठित अपराध का नेटवर्क फलता-फूलता रहा।

इसी समानांतर हिंदुओं के खिलाफ हिंसा तेज़ होती गई। मंदिरों पर हमले, जमीन हड़पना और महिलाओं पर अत्याचार केवल धार्मिक घृणा नहीं, बल्कि भारत की आंतरिक सुरक्षा को कमजोर करने की रणनीति का हिस्सा बने। हर हिंदू परिवार का पलायन भारत पर जनसांख्यिकीय, सामाजिक और सुरक्षा संबंधी दबाव बढ़ाता गया।

आज यह मानसिकता और अधिक खतरनाक रूप ले चुकी है। बांग्लादेश में अमेरिकी प्रभाव, चीनी निवेश और इस्लामी कट्टरपंथ मिलकर एक ऐसा त्रिकोण बना रहे हैं, जो भारत की सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती है। चीन के साथ बंदरगाहों, डीप-सी परियोजनाओं और रणनीतिक सहयोग ने इस आशंका को और मजबूत किया है कि बांग्लादेश को धीरे-धीरे भारत के खिलाफ एक रणनीतिक मोहरे के रूप में ढाला जा रहा है। इस पूरी प्रक्रिया का सबसे खतरनाक पहलू “डेमोग्राफिक वारफेयर” है, जिसमें मानव प्रवाह को हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है।

बांग्लादेश में हिंदुओं की लक्षित हत्याएँ, धार्मिक स्थलों पर हमले और भारत-विरोधी मानसिकता का योजनाबद्ध विस्तार अब किसी एक देश की आंतरिक समस्या नहीं रह गया है। यह क्षेत्रीय स्थिरता और अंतरराष्ट्रीय नैतिकता की गंभीर परीक्षा है। भारत अब वह देश नहीं है जो केवल प्रतीक्षा करता रहे। आज का भारत सजग, सक्षम और निर्णायक है। भारतीय सशस्त्र बल पूरी तरह सतर्क और समर्थ हैं।

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