नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को लोकसभा में ऑपरेशन सिंदूर को लेकर एक ऐतिहासिक और निर्णायक बयान दिया। अपने 1 घंटा 40 मिनट लंबे भाषण में उन्होंने कहा कि इस ऑपरेशन के दौरान दुनिया के किसी भी नेता ने भारत को रोका नहीं, और देश की सुरक्षा को लेकर भारत ने जो कदम उठाए, उन पर वैश्विक समर्थन भी मिला। इस दौरान उन्होंने अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का नाम लिए बिना संकेत भी दिया।
पाकिस्तान की घबराहट का खुलासा
प्रधानमंत्री मोदी ने सबसे चौंकाने वाला खुलासा तब किया जब उन्होंने बताया कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान के डीजीएमओ (Director General of Military Operations) ने भारत से गुहार लगाई थी। उन्होंने कहा:
“पाकिस्तान के DGMO ने कहा – बस करो, अब और मार नहीं झेल सकते।”
– नरेंद्र मोदी, लोकसभा में संबोधन के दौरान
यह बयान स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि भारत की सैन्य कार्रवाई का असर पाकिस्तान पर इतना जबरदस्त था कि उसे पीछे हटने के लिए आग्रह करना पड़ा।
कोई वैश्विक दबाव नहीं था
प्रधानमंत्री ने कहा कि इस बार भारत की सैन्य कार्रवाई के दौरान न तो संयुक्त राष्ट्र, न ही कोई वैश्विक नेता, और न ही राजनयिक दबाव भारत को रोक सका। उन्होंने जोर देकर कहा कि:
“दुनिया जानती है कि भारत अब आतंक और आक्रमण का जवाब उसी भाषा में देने में सक्षम है।”
इस बयान से यह संकेत मिलता है कि भारत की विदेश नीति और सुरक्षा रणनीति अब पहले से कहीं ज्यादा आत्मनिर्भर और निर्णायक हो चुकी है।
ट्रंप का नाम लिए बिना किया उल्लेख
मोदी ने अपने भाषण में किसी देश या नेता का नाम नहीं लिया, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उन्होंने अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की ओर इशारा किया, जिन्होंने पूर्व में भारत-पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता की पेशकश की थी। हालांकि, ऑपरेशन सिंदूर के वक्त अमेरिका या किसी अन्य देश ने भारत पर कोई दवाब नहीं डाला।
क्या है ऑपरेशन सिंदूर?
ऑपरेशन सिंदूर एक गोपनीय सैन्य कार्रवाई थी, जिसे भारत ने पाकिस्तान समर्थित आतंकी गतिविधियों के जवाब में अंजाम दिया। इसे भारतीय सेना की रणनीतिक सफलता के तौर पर देखा गया, जिसने सीमाओं पर भारतीय प्रभुत्व को और मज़बूत किया।
निष्कर्ष:
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह बयान सिर्फ पाकिस्तान को ही नहीं, बल्कि वैश्विक मंच पर भारत की शक्ति और संप्रभुता की पुष्टि भी करता है। अब भारत की सैन्य कार्रवाई और कूटनीति एक ऐसे दौर में प्रवेश कर चुकी है जहां आत्मनिर्भरता, निर्णायकता और राष्ट्रीय सुरक्षा सर्वोपरि है।


