नेपाल: महान भारत के भाल पर हिमालय की गंगा जमुना संस्कृति से पोषित नेपाल आज भस्मीभूत हो चुका है। संसद भवन, सिंह भवन, राष्ट्रपति भवन, सर्वोच्च न्यायालय और अनेक सरकारी संस्थान दो ही दिनों में राख हो चुके हैं। काठमांडू से लेकर नेपाल के दर्जन भर नगरों में जेलें खाली हो चुकी हैं, लगभग 13500 कैदी बिखर गए हैं, पुलिस थानों में हिरासत वाले 760 लोग लापता हैं और अनगिनत महत्वपूर्ण सरकारी रिकॉर्ड जल चुके हैं।
यह सब किसी अचानक हुई घटना नहीं, बल्कि वर्षों से रची गई एक साजिश का नतीजा प्रतीत होता है। माओवादी आंदोलन से प्रारंभ होकर निर्मित सरकारी व्यवस्थाएं मूल भावना के खिलाफ जाकर विध्वंश का मार्ग अपनाती चली गईं। अब नेपाल का हर पक्ष और विपक्ष अपने आप में खो चुका है। नेपाल नया नेतृत्व खोज रहा है और नई संरचना की मांग कर रहा है।
अतीत के संदर्भ में वर्तमान
मुझे व्यक्तिगत रूप से नेपाल को करीब से देखने का अवसर मिला है। महाराजा वीरेंद्र वीर विक्रम शाहदेव की हत्या से लेकर डी कंपनी के नेटवर्क तक, नेपाल में गहरे षड्यंत्र मौजूद रहे हैं। 1990 के दशक में भारत की संसद में भी नेपाल से जुड़े संदिग्ध गतिविधियों पर चर्चा हो चुकी है।
नेपाल का माओवादी आंदोलन एक कठोर उदाहरण है, जो एक प्रयोगशाला बना। सरकार ने इसे जबरदस्ती अपना लिया जबकि मूल नेपाल ने इसे स्वीकार नहीं किया। राजनीतिक चेहरे और पार्टियां समय-समय पर बदलती रहीं, लेकिन युवा पीढ़ी में घृणा ही उभरती गई।

भारत और नेपाल : भविष्य का दृष्टिकोण
नेपाल को पुनर्जीवित करने में वर्षों लग सकते हैं, लेकिन भारत के रूप में इसका सहोदर सहयोग अवश्य रहेगा। बाबा विश्वनाथ और बाबा पशुपतिनाथ की जोड़ी भारत-नेपाल के गहरे रिश्तों का प्रतीक है।
कुछ बुद्धि विलासियों ने अपनी बौद्धिक संपदा माओवादी आंदोलन के समय झोंकी थी और आज भी भारत विरोधी तत्वों के साथ मिलकर नेपाल में अशांति फैलाने का प्रयास कर रहे हैं। लेकिन भारत का नैतिक कर्तव्य यह है कि वह अपने पड़ोसी को मजबूती प्रदान करे।
निष्कर्ष:
नेपाल का पुनर्निर्माण केवल एक प्रशासनिक चुनौती नहीं, बल्कि यह सांस्कृतिक और संवेदनात्मक पुनरुत्थान का कार्य है। आने वाला समय बताएगा कि इस कठिन संघर्ष में कैसे नया नेपाल आकार लेगा। वर्तमान विध्वंश की पृष्ठभूमि में यह स्पष्ट है कि स्थायी समाधान केवल नीतिगत सुधार और सशक्त नेतृत्व से संभव है।


