अमेरिकी राष्ट्रपति: डोनाल्ड ट्रम्प ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर बड़ा कदम उठाते हुए अमेरिका को 66 अंतरराष्ट्रीय संगठनों से आधिकारिक रूप से बाहर निकालने की घोषणा की है। इनमें संयुक्त राष्ट्र की 31 एजेंसियां और 35 गैर-UN संस्थाएं शामिल हैं।
ब्रिटिश अखबार द गार्डियन के अनुसार, व्हाइट हाउस और अमेरिकी विदेश मंत्रालय का कहना है कि ये संगठन अमेरिकी हितों के खिलाफ काम कर रहे हैं, करदाताओं के पैसे की बर्बादी कर रहे हैं और कई संस्थाएं प्रभावी तरीके से संचालित नहीं हो रहीं। यह फैसला ट्रम्प की अमेरिका फर्स्ट नीति का हिस्सा माना जा रहा है।
अमेरिका 22 जनवरी के बाद WHO का सदस्य नहीं रहेगा
ट्रम्प प्रशासन पहले ही जनवरी 2025 में विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) से बाहर निकलने की घोषणा कर चुका था। WHO के नियमों के तहत एक साल का नोटिस अनिवार्य होता है, जो अब पूरा हो गया है। इसके बाद 22 जनवरी से अमेरिका आधिकारिक रूप से WHO का सदस्य नहीं रहेगा। इसे वैश्विक स्वास्थ्य सहयोग के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है।
UNFCCC और जलवायु संस्थाओं से अमेरिका की दूरी
इस फैसले का सबसे बड़ा असर जलवायु नीति पर पड़ेगा। अमेरिका संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (UNFCCC) से बाहर हो रहा है, जो 1992 में बनाया गया वैश्विक समझौता है। यह पेरिस जलवायु समझौते की बुनियाद माना जाता है।
इसके अलावा इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (IPCC) जैसी संस्थाओं से भी अमेरिका अलग हो रहा है। नवंबर 2025 में ब्राजील में हुई संयुक्त राष्ट्र जलवायु वार्ता में भी अमेरिका ने प्रतिनिधिमंडल नहीं भेजा था।
ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में अमेरिका दूसरे स्थान पर
विशेषज्ञों का कहना है कि इस फैसले से वैश्विक जलवायु प्रयासों को गंभीर नुकसान पहुंचेगा। अमेरिका दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जक देश है।
स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक रॉब जैक्सन सहित कई विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि इससे दूसरे देशों को भी अपनी जलवायु प्रतिबद्धताओं को टालने का बहाना मिल सकता है।
पूर्व बाइडेन प्रशासन की तीखी प्रतिक्रिया
जो बाइडेन प्रशासन की पूर्व जलवायु सलाहकार जीना मैकार्थी ने इस फैसले को कमजोर सोच वाला, शर्मनाक और मूर्खतापूर्ण करार दिया है। उन्होंने कहा कि इससे अमेरिका दशकों की जलवायु नेतृत्व भूमिका खो देगा और वैश्विक सहयोग कमजोर होगा।
नेचुरल रिसोर्सेज डिफेंस काउंसिल के अध्यक्ष मनीष बापना ने इसे खुद को नुकसान पहुंचाने वाला कदम बताया और कहा कि इससे चीन को स्वच्छ ऊर्जा तकनीक में बढ़त मिलेगी।
UNFPA और अन्य संस्थाओं से भी अमेरिका अलग
अमेरिका संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (UNFPA) से भी बाहर हो रहा है। ट्रम्प और रिपब्लिकन पार्टी का आरोप है कि यह एजेंसी जबरन गर्भपात को बढ़ावा देती है, हालांकि बाइडेन प्रशासन के दौरान हुई जांच में इसका कोई प्रमाण नहीं मिला था।
भारत की अगुआई वाला इंटरनेशनल सोलर अलायंस (ISA) भी इस फैसले से प्रभावित होगा, जिसकी शुरुआत 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और फ्रांस के तत्कालीन राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ने की थी।
विदेश मंत्री मार्को रूबियो का बयान
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने कहा कि ये समझौते अमेरिका की प्रगति में बाधा बन रहे थे। उन्होंने स्पष्ट किया कि अमेरिका उन संगठनों को आर्थिक सहायता नहीं देगा जो उसके राष्ट्रीय हितों के खिलाफ काम करते हैं।
कहां बनाए रखना चाहता है अमेरिका प्रभाव
हालांकि अमेरिका कुछ संस्थाओं में अपनी भूमिका मजबूत बनाए रखना चाहता है, खासकर वहां जहां चीन से सीधी प्रतिस्पर्धा है। इनमें इंटरनेशनल टेलीकम्युनिकेशन यूनियन और इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन शामिल हैं।
डोनाल्ड ट्रम्प का यह फैसला अमेरिका की विदेश नीति में बड़े बदलाव का संकेत देता है। समर्थक इसे अमेरिकी संप्रभुता और करदाताओं के पैसे की बचत मानते हैं, जबकि आलोचकों के अनुसार इससे अमेरिका वैश्विक मंच पर अलग-थलग पड़ सकता है और जलवायु, स्वास्थ्य व कूटनीति के क्षेत्र में उसकी भूमिका कमजोर हो सकती है।


