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सुप्रीम कोर्ट का सख्त संदेश: एसिड अटैक पर केंद्र बनाए कड़ा कानून, बोले– दर्दनाक सजा के बिना नहीं रुकेंगे ऐसे अपराध

एसिड अटैक मामलों में सुधारवादी सिद्धांत खारिज, कोर्ट ने कहा– दहेज हत्या की तरह आरोपी पर ही हो सकता है सबूत का बोझ

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने एसिड अटैक के बढ़ते मामलों पर गहरी चिंता जताते हुए केंद्र सरकार से सख्त कानून बनाने पर विचार करने को कहा है। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जब तक आरोपियों को दर्दनाक और कड़ी सजा नहीं मिलेगी, तब तक ऐसे जघन्य अपराध रुकने वाले नहीं हैं।

मंगलवार को हुई सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस आर. महादेवन और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि एसिड अटैक जैसे मामलों में सुधारवादी दंड सिद्धांत की कोई जगह नहीं है। कोर्ट ने संकेत दिया कि ऐसे अपराधों में दहेज हत्या की तरह आरोपी पर ही अपनी बेगुनाही साबित करने का बोझ डाला जा सकता है

चार हफ्ते में सभी राज्यों से मांगी पूरी रिपोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और सभी राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों को चार हफ्ते के भीतर एसिड अटैक मामलों से जुड़ी विस्तृत जानकारी देने का निर्देश दिया है। इसमें शामिल होगा—

  • साल-दर-साल दर्ज एसिड अटैक मामलों की संख्या

  • कोर्ट में लंबित मामलों की स्थिति

  • दोषसिद्धि और बरी होने के आंकड़े

  • पीड़ितों के इलाज और पुनर्वास के लिए उठाए गए कदम

दोषियों की संपत्ति जब्त कर मुआवजे का सवाल

सुनवाई के दौरान सीजेआई ने अहम सवाल उठाया कि दोषियों की संपत्ति जब्त कर पीड़ितों को मुआवजा देने पर क्यों विचार नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि सिर्फ सजा ही नहीं, बल्कि पीड़ित के जीवन की भरपाई के लिए ठोस आर्थिक सहायता भी जरूरी है।

शाहीना मलिक की याचिका पर सुनवाई

यह सुनवाई हरियाणा की शाहीना मलिक द्वारा दायर जनहित याचिका पर हो रही है। शाहीना खुद एसिड अटैक सर्वाइवर हैं। उन्होंने कोर्ट को बताया कि उनके मामले में सभी आरोपी बरी हो चुके हैं, जिसके खिलाफ उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट में अपील दायर की है।

शाहीना की स्थिति को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें मुफ्त कानूनी सहायता देने की पेशकश की और कहा कि वे अपनी पसंद के अच्छे वकीलों की सेवाएं ले सकती हैं।

26 साल की उम्र में हुआ था हमला

शाहीना मलिक ने बताया कि जब उन पर एसिड अटैक हुआ, तब उनकी उम्र 26 साल थी। अब वे 42 साल की हो चुकी हैं, लेकिन अभी भी अंतिम न्याय का इंतजार कर रही हैं। उन्होंने कहा कि 16 साल तक अदालतों के चक्कर लगाने के बाद भी आरोपियों का बरी हो जाना बेहद निराशाजनक है।

कोर्ट ने और कौन-सी जानकारियां मांगीं

सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों से यह भी स्पष्ट जानकारी मांगी है—

  • हर पीड़िता की शिक्षा, नौकरी और वैवाहिक स्थिति

  • इलाज की वर्तमान हालत और अब तक व भविष्य में होने वाला खर्च

  • पीड़ितों के लिए चल रही पुनर्वास योजनाएं

  • जबरन एसिड पिलाने के मामलों का अलग विवरण

यूपी में सबसे ज्यादा मामले लंबित

कोर्ट के अनुसार अब तक 15 हाईकोर्ट से मिली जानकारी के आधार पर—

  • उत्तर प्रदेश में 198

  • गुजरात में 114

  • बिहार में 68

  • पश्चिम बंगाल में 60

  • महाराष्ट्र में 58

एसिड अटैक से जुड़े मामले अभी भी लंबित हैं। कोर्ट ने हाईकोर्ट्स से इन मामलों को प्राथमिकता पर सुनने और तय समय में निपटाने पर विचार करने को कहा है।

देशभर में 844 केस लंबित

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की 2025 में जारी रिपोर्ट के अनुसार, देश की विभिन्न अदालतों में 844 एसिड अटैक केस लंबित हैं। ये आंकड़े वर्ष 2023 तक के हैं। रिपोर्ट के मुताबिक 2021 के बाद से एसिड अटैक के मामलों में लगातार बढ़ोतरी हुई है।

फ्लोरिडा इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी की 2024 की रिपोर्ट के अनुसार भारत में हर साल 250 से 300 एसिड अटैक केस दर्ज होते हैं, जबकि वास्तविक संख्या 1,000 से अधिक हो सकती है। कई मामले डर, सामाजिक दबाव और कानूनी जटिलताओं के कारण दर्ज ही नहीं हो पाते।

सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी केवल कानूनी चेतावनी नहीं, बल्कि समाज और सरकार दोनों के लिए कड़ा संदेश है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि एसिड अटैक जैसे अमानवीय अपराधों से निपटने के लिए कठोर कानून, सख्त सजा और प्रभावी पुनर्वास नीति समय की मांग है। अब निगाहें केंद्र सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं कि वह इस दिशा में कितना सख्त और निर्णायक फैसला लेती है।

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