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सुप्रीम कोर्ट में वकील बोले- मस्जिद सभी के लिए खुली:इसका मतलब पूजा नहीं कर सकते; हिजाब धर्म में जरूरी, लेकिन स्कूल में नहीं

Supreme Court of India: में इन दिनों धार्मिक स्वतंत्रता और संस्थागत नियमों के टकराव पर एक अहम सुनवाई जारी है। नई दिल्ली में चल रही इस सुनवाई का मंगलवार को नौवां दिन था, जहां सबरीमाला मंदिर समेत विभिन्न धार्मिक स्थलों में महिलाओं के प्रवेश से जुड़े मामलों पर विस्तृत बहस हुई।

इस सुनवाई के दौरान एक महत्वपूर्ण दलील सामने आई, जिसमें कहा गया कि किसी धार्मिक स्थल का ‘सभी के लिए खुला होना’ यह नहीं दर्शाता कि वहां कोई भी व्यक्ति अपनी इच्छा के अनुसार पूजा-पद्धति अपना सकता है।

मस्जिद पर दलील: प्रवेश और पूजा अलग बात

मुस्लिम पक्ष की ओर से पेश एडवोकेट निजाम पाशा ने कहा कि अगर किसी मोहल्ले की मस्जिद सभी के लिए खुली भी हो, तब भी वहां कोई व्यक्ति जाकर घंटी नहीं बजा सकता या आरती नहीं कर सकता। हर धार्मिक स्थल की अपनी मर्यादा और परंपराएं होती हैं, जिनका पालन जरूरी है।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि धार्मिक ग्रंथों में हर प्रथा का विस्तृत उल्लेख नहीं होता, लेकिन पैगंबर की परंपराएं और सामाजिक अभ्यास भी धर्म का महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं।

हिजाब पर क्या कहा गया?

हिजाब को लेकर भी अदालत में अहम टिप्पणी की गई। वकील ने कहा कि कोई व्यक्ति हिजाब को धार्मिक रूप से जरूरी मान सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वह हर संस्थान—जैसे स्कूल—में उसे पहनने का अधिकार स्वतः पा जाता है।

यानी धार्मिक विश्वास और संस्थागत नियमों के बीच संतुलन जरूरी है। यह तर्क सीधे तौर पर उस बहस से जुड़ा है, जिसमें स्कूलों और कॉलेजों में ड्रेस कोड बनाम धार्मिक स्वतंत्रता का मुद्दा उठता रहा है।

सबरीमाला और महिलाओं का प्रवेश

सुनवाई के दौरान सबरीमाला मंदिर का मुद्दा भी केंद्र में रहा। कुछ वकीलों ने तर्क दिया कि हर धार्मिक प्रथा को भेदभाव के नजरिये से नहीं देखा जाना चाहिए।

एक वकील ने असम के कामाख्या मंदिर का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां मासिक धर्म को उत्सव की तरह मनाया जाता है और कुछ समय मंदिर में केवल महिलाओं को ही प्रवेश मिलता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि धार्मिक परंपराएं विविध और जटिल होती हैं।

क्या देवता तय कर सकते हैं नियम?

बहस के दौरान एक और दिलचस्प तर्क सामने आया कि धार्मिक स्थलों के नियम ‘देवता’ की मान्यताओं और परंपराओं पर आधारित होते हैं। एक वकील ने कहा कि देवता को एक ‘कानूनी व्यक्ति’ माना जाता है, जिनके अपने अधिकार और मर्यादाएं होती हैं।

हालांकि, इस पर जजों ने सवाल उठाए और स्पष्टता मांगी कि ऐसे सिद्धांतों को संवैधानिक ढांचे में कैसे लागू किया जा सकता है।

व्यक्ति बनाम संप्रदाय का अधिकार

बहस का एक बड़ा हिस्सा इस सवाल पर केंद्रित रहा कि धार्मिक अधिकार पहले व्यक्ति का है या संप्रदाय का। कुछ वकीलों ने कहा कि संविधान के तहत व्यक्ति की धार्मिक स्वतंत्रता सर्वोपरि है, जबकि अन्य का मानना था कि धार्मिक संस्थाओं को भी अपनी परंपराओं को बनाए रखने का अधिकार होना चाहिए।

कोर्ट की भूमिका कितनी हो?

कई पक्षों ने यह भी कहा कि अदालत को धार्मिक मामलों में सीमित दखल देना चाहिए, खासकर तब जब कोई प्रथा ‘क्रूरता’ की श्रेणी में न आती हो। वहीं, कुछ ने तर्क दिया कि अगर किसी प्रथा से समानता और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होता है, तो अदालत का हस्तक्षेप जरूरी है।

सुप्रीम कोर्ट में चल रही यह सुनवाई केवल सबरीमाला या हिजाब तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत में धर्म, संविधान और अधिकारों के बीच संतुलन की बड़ी बहस बन चुकी है। आने वाले दिनों में कोर्ट का फैसला यह तय करेगा कि धार्मिक परंपराओं और व्यक्तिगत अधिकारों के बीच रेखा कहां खींची जाए।

News Desk

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