नई दिल्ली: क्या यह मुलाकात एक नई शुरुआत है या फिर राजनीतिक चाल?
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत और अखिल भारतीय इमाम संगठन के अध्यक्ष इमाम उमर अहमद इल्यासी की हालिया मुलाकात ने राजनीतिक हलकों में नई बहस को जन्म दे दिया है।
दिल्ली के हरियाणा भवन में आयोजित इस अहम बैठक में पांच राज्यों के 50 से अधिक मुस्लिम धर्मगुरु और विद्वान शामिल हुए। इसमें दारुल उलूम देवबंद के प्रतिनिधि भी उपस्थित थे।
आरएसएस की ‘संवाद’ रणनीति या भाजपा की ‘वोट बैंक’ नीति?
यह कोई पहली बार नहीं है जब मोहन भागवत ने मुस्लिम समुदाय से सीधा संवाद किया हो। 2022 में भी उन्होंने दिल्ली की मस्जिद और मदरसे का दौरा कर इमाम इल्यासी से मुलाकात की थी। उस समय इल्यासी ने उन्हें ‘राष्ट्रपिता’ और ‘राष्ट्रऋषि’ कहकर संबोधित किया था।
इस बार की साढ़े तीन घंटे की बैठक में मंदिर-मस्जिद विवाद, मदरसों, गुरुकुलों और सामाजिक समरसता जैसे मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई।
इमाम इल्यासी ने इस बैठक को “विश्वास निर्माण और राष्ट्रीय एकता की दिशा में एक सकारात्मक कदम” बताया।
भाजपा की रणनीति: मुस्लिम वोटों की ओर एक और कदम?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2024 के लोकसभा चुनावों में अपेक्षित मुस्लिम समर्थन न मिलने के बाद भाजपा अब 2029 की तैयारी में ‘नरम हिंदुत्व’ की ओर झुकाव दिखा रही है।
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2023 में ‘मोदी मित्र’ जैसे अभियानों के माध्यम से भाजपा ने मुस्लिम युवाओं को जोड़ने की कोशिश की थी।
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अब RSS के मंच से मुस्लिम समुदाय से सीधा संवाद एक राजनीतिक संकेत भी हो सकता है।
रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, भाजपा ने पिछले कुछ वर्षों में मुस्लिम वोटों को लेकर रणनीतिक रूप से ‘मित्रता अभियानों’ को अपनाया है, जिनका लक्ष्य छवि सुधार और सीमित समर्थन हासिल करना रहा है।
विरोधाभास या दोहरा मापदंड?
विपक्ष और आलोचकों का तर्क है कि यह मुलाकात एक तरह का ‘धार्मिक भ्रम और मतदाताओं को बांटने का प्रयास’ हो सकती है।
नेशनल हेराल्ड में प्रकाशित विश्लेषण में दावा किया गया कि यह केवल छवि सुधार की कोशिश है, जबकि हकीकत में भाजपा शासित राज्यों में
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हिजाब बैन,
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मदरसा सर्वे,
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‘लव जिहाद’ के नाम पर कार्रवाई जैसे कई कठोर कदम उठाए गए हैं।
यह विरोधाभास इस ‘संवाद’ प्रक्रिया की ईमानदारी पर सवाल खड़े करता है।
मुस्लिम नेताओं की प्रतिक्रियाएं बंटी हुई
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इमाम इल्यासी ने इस मुलाकात को सकारात्मक बताया और कहा, “हम अलग धर्मों के लोग हैं, पर एक भारतवासी हैं।”
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असदुद्दीन ओवैसी (AIMIM) ने तीखा प्रहार करते हुए इसे ‘मुस्लिम अभिजात्य वर्ग का दिखावा’ करार दिया।
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जमीअत उलेमा-ए-हिंद के मौलाना अरशद मदनी ने कहा, “जब तक आरएसएस और भाजपा की नीतियों में बदलाव नहीं होता, तब तक यह ‘मुलाकातें’ प्रतीकात्मक ही रहेंगी।”
क्या कहता है आरएसएस?
RSS के सूत्रों और मुस्लिम राष्ट्रीय मंच (MRM) के संरक्षक इंद्रेश कुमार, जो इस बैठक में मौजूद थे, ने कहा कि “भारत की एकता, संस्कृति और मूल्यों को मजबूत करना ही उद्देश्य है।”
MRM पिछले कई वर्षों से मुस्लिम समाज से जुड़ने की कोशिश कर रहा है और ‘एक राष्ट्र, एक ध्वज, एक राष्ट्रगान’ जैसे अभियानों के जरिए समावेश की बात करता रहा है, लेकिन विरोधी इसे ‘एकरूपता थोपने’ की नीति करार देते हैं।
निष्कर्ष: संवाद की पहल या राजनीतिक दिशा-परिवर्तन?
मोहन भागवत और इमाम इल्यासी की मुलाकात निश्चित रूप से राजनीतिक और सामाजिक दृष्टिकोण से एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम है। यह हिंदू-मुस्लिम एकता और संवाद की संभावना को बढ़ाता है, लेकिन इसके राजनीतिक मकसद को लेकर संदेह और विश्लेषण दोनों जारी हैं।



