दिल्ली हाईकोर्ट: ने नाबालिग लड़की के साथ दुष्कर्म और उसके आत्महत्या के मामले में आरोपी की जमानत याचिका सख्ती से खारिज करते हुए कहा है कि नाबालिग से संबंध बनाकर विवाह करना किसी भी हाल में अपराध को “पवित्र” नहीं बना सकता। यह फैसला न्यायमूर्ति संजीव नरूला ने सुनाया, जो बच्चों के विरुद्ध हो रहे यौन अपराधों के मामलों में अदालत की गंभीरता को दर्शाता है।
POCSO के तहत दर्ज हुआ मामला, आरोपी ने दिया विवाह का तर्क
यह मामला पॉक्सो अधिनियम और दुष्कर्म की धाराओं के तहत दर्ज किया गया था। आरोपी ने कोर्ट में यह तर्क दिया कि मृतका के साथ संबंध सहमति से थे और बाद में दोनों का विवाह भी हो गया था। वह यह भी कहता है कि गर्भधारण भी सहमति से हुआ था, अतः यह दुष्कर्म नहीं माना जाना चाहिए।
लेकिन अदालत ने इस तर्क को पूरी तरह खारिज कर दिया और कहा कि “कथित विवाह” कानून की नजर में वैध नहीं है, क्योंकि पीड़िता नाबालिग थी। ऐसे में इसे वैधानिक दुष्कर्म से राहत का आधार नहीं माना जा सकता।
34 वर्षीय आरोपी और 16 वर्षीय पीड़िता के बीच उम्र का बड़ा फासला, अदालत ने जताई चिंता
कोर्ट ने कहा कि आरोपी की उम्र 34 वर्ष और पीड़िता की उम्र महज 16 वर्ष होने से स्पष्ट शोषण और प्रभाव के संकेत मिलते हैं। यह उम्र और सामाजिक असमानता किसी भी “सहमति” की धारणा को कमजोर कर देती है। खासकर तब, जब पीड़िता आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि से आती हो।
न्यायमूर्ति नरूला ने कहा, “यह असमानता सिर्फ उम्र की नहीं, बल्कि सामाजिक और मानसिक स्थिति की भी है, जो किसी भी स्वीकृति को भ्रमित कर देती है।”
गर्भवती होने का आरोप, आरोपी के व्यवहार से आत्महत्या की आशंका
मृतक की बहन के अनुसार, पीड़िता लगभग दो महीने की गर्भवती थी और आरोपी लगातार उसके साथ शारीरिक शोषण कर रहा था। कोर्ट ने इस बात को गंभीर मानते हुए कहा कि मृतका द्वारा आत्महत्या जैसा कदम उठाना, आरोपी के व्यवहार से जुड़ा हो सकता है, जिससे मामले की गंभीरता और बढ़ जाती है।
कोर्ट का निष्कर्ष: आरोपी को नहीं दी जा सकती राहत
अदालत ने कहा कि अभियुक्त के इस तर्क को मानना संभव नहीं है कि मृतका की उम्र 19 वर्ष थी। यदि ऐसा कोई विवाद है, तो उसका निपटारा मुकदमे के दौरान साक्ष्यों के आधार पर किया जाएगा, न कि जमानत के स्तर पर।
कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि:
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आरोपी के खिलाफ गंभीर आरोप हैं
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सबूतों से छेड़छाड़ और फरार होने का खतरा बना रहता है
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जनहित और बच्चों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए आरोपी को कोई राहत नहीं दी जा सकती
निष्कर्ष:
यह फैसला न्यायपालिका के उस रुख को रेखांकित करता है जो बच्चों के साथ अपराधों पर “जीरो टॉलरेंस” की नीति अपनाने को प्रतिबद्ध है। दिल्ली हाईकोर्ट का यह फैसला एक स्पष्ट संदेश देता है कि कानून की नजर में नाबालिग की सहमति वैध नहीं मानी जाती, और शादी जैसे तर्क किसी भी सूरत में ऐसे अपराध को वैध नहीं बना सकते।


