नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को प्रवर्तन निदेशालय (ED) को कड़ी फटकार लगाई और राजनीतिक मामलों में जांच एजेंसियों के दुरुपयोग पर गंभीर सवाल उठाए। मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने कहा कि राजनीतिक लड़ाइयां चुनाव के मैदान में लड़ी जानी चाहिए, एजेंसियों के माध्यम से नहीं।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा—
“हमारा मुंह मत खुलवाइए, नहीं तो हमें ED के बारे में कठोर टिप्पणी करनी पड़ेगी। मेरे पास महाराष्ट्र का अनुभव है, कृपया इस प्रकार की हिंसा पूरे देश में मत फैलाइए।”
यह मामला कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की पत्नी बीएम पार्वती को भेजे गए ED समन से जुड़ा है, जो मैसूर अर्बन डेवलपमेंट अथॉरिटी (MUDA) केस से जुड़ा हुआ है। कर्नाटक हाईकोर्ट पहले ही मार्च में यह समन रद्द कर चुका था, जिसे ED ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। अब सुप्रीम कोर्ट ने भी ED की अपील खारिज कर दी है।
क्या है MUDA केस?
साल 1992 में मैसूर अर्बन डेवलपमेंट अथॉरिटी (MUDA) ने रिहायशी क्षेत्र विकसित करने के लिए किसानों से ज़मीन अधिग्रहित की थी। बदले में 50:50 स्कीम के तहत किसानों को वैकल्पिक भूमि दी जानी थी।
इस मामले में आरोप है कि सिद्धारमैया की पत्नी को वास्तविक ज़मीन के बदले में उच्च मूल्य की ज़मीन दी गई। साथ ही दस्तावेजों में गड़बड़ी के आरोप भी लगे हैं।
सिद्धारमैया और परिवार पर क्या आरोप हैं?
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पार्वती को मिली जमीन की कीमत ज्यादा: आरोप है कि पार्वती को कसारे गांव की जमीन के बदले विजयनगर जैसे प्रीमियम इलाके में MUDA ने प्लॉट दिया।
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जालसाजी और पावर का दुरुपयोग: RTI के माध्यम से सामने आया कि कई लोगों को फर्जी तरीके से लाभ मिला है। कांग्रेस सरकार में रहते हुए सिद्धारमैया ने अपने पद का गलत इस्तेमाल किया।
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राजनीतिक आरोप: भाजपा ने इस मामले को लेकर सिद्धारमैया और कांग्रेस पार्टी पर सीधा हमला बोला। प्रवक्ता संबित पात्रा ने इसे 3 से 4 हजार करोड़ रुपए का घोटाला बताया।
सुप्रीम कोर्ट पहले भी कर चुका है तीखी टिप्पणी
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22 मई: तमिलनाडु शराब लाइसेंस मामले में भी कोर्ट ने कहा था कि ED “सारी हदें पार” कर चुका है।
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18 जुलाई: NIA मामलों की धीमी सुनवाई पर कोर्ट ने केंद्र सरकार को फटकार लगाई और विशेष कोर्ट बनाने की मांग की।
निष्कर्ष:
सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणियों से यह साफ हो गया है कि वह एजेंसियों के राजनीतिक इस्तेमाल को लेकर बेहद चिंतित है। ED जैसी संस्थाओं की विश्वसनीयता पर सवाल उठना देश के लोकतांत्रिक ढांचे के लिए खतरे की घंटी है। कोर्ट का यह संदेश न केवल कानूनी बल्कि राजनीतिक मोर्चे पर भी दूरगामी प्रभाव डाल सकता है।


