नई दिल्ली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने एक बार फिर भारत के इतिहास लेखन और शिक्षा व्यवस्था पर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि आज जो इतिहास पढ़ाया जा रहा है, वह पश्चिमी दृष्टिकोण से लिखा गया है। ऐसे पाठ्यक्रमों में चीन और जापान जैसे देशों का उल्लेख है, लेकिन भारत की सही छवि और गौरवशाली अतीत गायब है।
भागवत ने कहा कि “इतिहास केवल तथ्यों का संकलन नहीं होता, बल्कि यह उस देश की आत्मा को दर्शाने का माध्यम होता है। हमारी नई पीढ़ी को अपनी जड़ों और सांस्कृतिक मूल्यों से जोड़ने के लिए शिक्षा प्रणाली में व्यापक परिवर्तन आवश्यक है।”
“दुनिया को नई दिशा भारतीयता से ही मिलेगी”
भागवत ने कहा कि आज पूरी दुनिया भ्रम, अशांति और संघर्ष के दौर से गुजर रही है। तीसरे विश्व युद्ध की आशंका की बात करते हुए उन्होंने कहा कि “विश्व को अगर शांति और संतुलन की ओर ले जाना है, तो भारतीयता ही उसका एकमात्र रास्ता है।”
उन्होंने कहा कि भारत ने हमेशा “वसुधैव कुटुम्बकम्” के सिद्धांत को अपनाया है। यह केवल नारा नहीं, बल्कि भारत की आत्मा है। उन्होंने शिक्षा नीति, संस्कृति, समाज और राजनीति में भी भारतीय मूल्यों की वापसी की आवश्यकता पर जोर दिया।
पाठ्यक्रमों में बदलाव समय की मांग
RSS प्रमुख ने यह भी कहा कि अब समय आ गया है जब भारत की नई पीढ़ी को भारत के गौरवशाली अतीत, वैज्ञानिक उपलब्धियों, सांस्कृतिक धरोहर और ऐतिहासिक योद्धाओं के बारे में सच्ची जानकारी दी जाए।
उन्होंने सुझाव दिया कि “पाठ्यक्रम में ऐसे बदलाव लाए जाएं जिससे छात्र केवल विदेशी विजेताओं की कहानी ही न पढ़ें, बल्कि भारत के सच्चे नायकों को जानें और समझें।”
राजनीतिक और वैचारिक हलचल तेज
भागवत के इस बयान को शिक्षा नीति में संभावित बड़े बदलावों से जोड़कर देखा जा रहा है। साथ ही यह बयान ऐसे समय आया है जब देश में नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के तहत पाठ्यक्रमों के पुनर्गठन की चर्चा जोरों पर है।
निष्कर्ष:
मोहन भागवत का यह बयान न केवल शिक्षा व्यवस्था की दिशा में सुधार की ओर संकेत करता है, बल्कि यह भी बताता है कि भारत को विश्व में एक सांस्कृतिक नेतृत्वकर्ता के रूप में स्थापित करने की ज़रूरत है। उनके अनुसार, इसके लिए सबसे जरूरी है—अपने इतिहास, अपनी भाषा और अपने मूल्यों के प्रति गर्व और जागरूकता।