लखनऊ | उत्तर प्रदेश में प्राथमिक विद्यालयों के मर्जर को लेकर चल रही बहस बुधवार को लखनऊ स्थित इलाहाबाद हाईकोर्ट की बेंच में फिर से गरमाई। कोर्ट में मामले की सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से अपर महाधिवक्ता (AAG) ने मजबूती से पक्ष रखते हुए स्पष्ट किया कि राज्य सरकार द्वारा किए गए स्कूलों के विलय का निर्णय पूरी तरह नियमों के अनुरूप और बच्चों के हित में है।
सरकारी पक्ष ने कोर्ट को बताया कि जिन स्कूलों में छात्र नाममात्र हैं या वर्षों से खाली पड़े हैं, उन्हें बंद नहीं किया गया बल्कि उन्हें बाल वाटिका (pre-primary) और आंगनबाड़ी केंद्रों के रूप में उपयोग करने की योजना बनाई गई है।
क्या कहा सरकार ने?
अपर महाधिवक्ता ने अपने तर्क में कहा:
“बच्चों की गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और संसाधनों के अधिकतम उपयोग के लिए यह फैसला लिया गया है। खाली पड़े भवनों को बेकार छोड़ने की बजाय उनका उपयोग अब छोटे बच्चों की प्रारंभिक शिक्षा के लिए किया जाएगा।”
पृष्ठभूमि:
प्रदेश सरकार ने बीते वर्ष उन प्राथमिक स्कूलों का विलय करने का निर्णय लिया था जिनमें छात्रों की संख्या बेहद कम थी – यानी 20 से कम नामांकित छात्र। इस फैसले के खिलाफ कई सामाजिक संगठनों और अभिभावकों ने याचिकाएं दाखिल की थीं, जिसमें कहा गया कि इससे ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा तक पहुंच पर असर पड़ेगा।
याचिकाकर्ताओं की आपत्तियाँ:
याचिकाकर्ता पक्ष का कहना है कि –
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स्कूल बंद होने से बच्चों को अधिक दूर तक पैदल जाना पड़ेगा।
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बालिकाओं की शिक्षा प्रभावित होगी।
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शिक्षकों की संख्या में असंतुलन उत्पन्न होगा।
अदालत की प्रतिक्रिया:
कोर्ट ने सरकार से पूछा कि मर्जर के बाद छात्रों को किस तरह की वैकल्पिक व्यवस्था दी गई है? क्या कोई ट्रांसपोर्ट सुविधा है? क्या सभी बच्चों को नजदीकी स्कूल में प्रवेश मिला है?
अगली सुनवाई कल:
कोर्ट ने इस मुद्दे पर विस्तृत दस्तावेज तलब किए हैं। अब इस मामले की अगली सुनवाई 24 जुलाई 2025 को होगी, जिसमें याचिकाकर्ताओं और सरकार दोनों से विस्तृत स्पष्टीकरण की उम्मीद की जा रही है।
निष्कर्ष:
स्कूल मर्जर पर उत्तर प्रदेश सरकार ने हाईकोर्ट में अपने फैसले का जोरदार बचाव किया है। उन्होंने यह भी साफ किया कि शिक्षा के बुनियादी ढांचे का अधिकतम उपयोग किया जाएगा और कोई भवन बेकार नहीं छोड़ा जाएगा। अब देखना यह होगा कि कल की सुनवाई में अदालत इस पर क्या फैसला सुनाती है।


