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Hartalika Teej 2026: क्यों किया जाता है निर्जला व्रत? जानें हरतालिका तीज की कथा, पूजा विधि और जरूरी नियम

आचार्य संजय तिवारी:

नई दिल्ली। सनातन परंपरा में हरतालिका तीज को महिलाओं के प्रमुख व्रतों में से एक माना जाता है। भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाया जाने वाला यह पर्व माता पार्वती और भगवान शिव की आराधना से जुड़ा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी। इसी कारण हरतालिका तीज को तप, आस्था और दांपत्य सुख की कामना से जुड़ा पर्व माना जाता है।

इस दिन सुहागिन महिलाएं पति की दीर्घायु और अखंड सौभाग्य की कामना से व्रत रखती हैं। वहीं, कई परंपराओं में अविवाहित कन्याओं द्वारा भी अच्छे वर की कामना से यह व्रत रखने की मान्यता है।

क्यों खास है हरतालिका तीज?

हरतालिका तीज को कई स्थानों पर गौरी तृतीया के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक परंपरा में इस दिन भगवान शिव, माता गौरी और भगवान गणेश की पूजा का विशेष महत्व बताया गया है।

कई क्षेत्रों में महिलाएं इस दिन नए वस्त्र पहनकर श्रृंगार करती हैं और पूजा के लिए विशेष फुलेरा सजाती हैं। इसके बाद शिव-पार्वती की पूजा, कथा और आरती की जाती है।

हरतालिका तीज की एक प्रमुख विशेषता इसका निर्जला व्रत है। परंपरा के अनुसार कुछ महिलाएं पूरे दिन और रात बिना अन्न-जल ग्रहण किए अगले दिन पूजा के बाद व्रत खोलती हैं।

हालांकि, स्वास्थ्य की स्थिति को ध्यान में रखना जरूरी है। लंबे समय तक भोजन और पानी न लेना हर व्यक्ति के लिए सुरक्षित नहीं हो सकता। विशेष रूप से बीमार, गर्भवती या स्वास्थ्य संबंधी समस्या वाले लोगों को व्रत के नियमों के संबंध में चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए।

‘हरतालिका’ नाम कैसे पड़ा?

हरतालिका नाम के पीछे भी एक प्रसिद्ध धार्मिक कथा है। मान्यता के अनुसार माता पार्वती भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करना चाहती थीं और इसके लिए उन्होंने कठोर तपस्या की।

जब उनके पिता हिमालय ने उनका विवाह भगवान विष्णु से करने की इच्छा जताई, तो पार्वती इससे दुखी हो गईं। उनकी सहेली उन्हें वन में ले गई, जहां उन्होंने छिपकर भगवान शिव की आराधना और तपस्या की।

इसी प्रसंग से हरतालिका नाम जुड़ा माना जाता है। ‘हरत’ को हरण या ले जाना और ‘आलिका’ को सखी अर्थात सहेली से जोड़कर इस पर्व का नाम हरतालिका बताया जाता है।

माता पार्वती ने की थी कठोर तपस्या

हरतालिका तीज की कथा के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए लंबे समय तक कठोर तपस्या की।

धार्मिक मान्यता में उनके तप का वर्णन अलग-अलग परिस्थितियों में किया गया है। कहा जाता है कि उन्होंने कठिन मौसम की परिस्थितियों में भी अपनी साधना जारी रखी और लंबे समय तक तप किया।

उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें पति रूप में स्वीकार करने का वरदान दिया। बाद में हिमालय ने भी पार्वती की इच्छा को स्वीकार किया और उनका विवाह भगवान शिव से हुआ।

इसी कथा के कारण हरतालिका तीज को शिव-पार्वती के अटूट संबंध और पार्वती की तपस्या से जोड़कर देखा जाता है।

हरतालिका तीज व्रत के प्रमुख नियम

परंपराओं के अनुसार इस व्रत से जुड़े कई नियम बताए जाते हैं।

  • व्रत को कई स्थानों पर निर्जला रखने की परंपरा है।
  • सुहागिन महिलाएं अखंड सौभाग्य और पति की दीर्घायु की कामना करती हैं।
  • अविवाहित कन्याएं अच्छे वर की कामना से व्रत रख सकती हैं।
  • दिन में शिव-पार्वती की पूजा और कथा का पाठ किया जाता है।
  • कई स्थानों पर रातभर जागरण, भजन और आरती की परंपरा है।
  • अगले दिन पूजा के बाद व्रत खोलने की परंपरा बताई गई है।
  • कई परिवारों में इसे पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा के रूप में मनाया जाता है।

विधवा महिलाओं के व्रत रखने को लेकर अलग-अलग क्षेत्रीय परंपराएं मिलती हैं, इसलिए इस विषय में स्थानीय मान्यता और परिवार की परंपरा का पालन किया जाता है।

हरतालिका तीज की पूजा विधि

हरतालिका तीज की पूजा आमतौर पर प्रदोष काल में करने की परंपरा बताई जाती है।

पूजा के लिए कई परिवारों में बालू या गीली काली मिट्टी से भगवान शिव, माता गौरी और भगवान गणेश की प्रतिमाएं बनाई जाती हैं। पूजा स्थल को फूलों से सजाया जाता है और चौकी पर प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं।

इसके बाद कलश स्थापना की जाती है। कलश पर स्वास्तिक बनाया जाता है और अक्षत, कुमकुम तथा पुष्प अर्पित किए जाते हैं।

पूजन क्रम में पहले भगवान गणेश की पूजा, फिर भगवान शिव और उसके बाद माता गौरी की पूजा की जाती है। माता गौरी को श्रृंगार सामग्री अर्पित करने की भी परंपरा है।

इसके बाद हरतालिका तीज की कथा का पाठ किया जाता है और भगवान की आरती की जाती है। कई स्थानों पर रातभर जागरण और अलग-अलग समय पर पूजा-अर्चना करने की परंपरा भी है।

पूजा सामग्री में क्या-क्या चाहिए?

हरतालिका तीज के पूजन में क्षेत्रीय परंपरा के अनुसार सामग्री अलग हो सकती है। सामान्य तौर पर पूजा के लिए फूल, फल, पत्ते, केले के पत्ते, मिट्टी या बालू, कलश, नारियल, दीपक, घी, तेल, कपूर, कुमकुम, अक्षत, सिंदूर, चंदन और वस्त्र आदि रखे जाते हैं।

माता गौरी के लिए चूड़ी, बिंदी, काजल, सिंदूर, मेहंदी, कंघी और अन्य श्रृंगार सामग्री अर्पित करने की परंपरा भी कई क्षेत्रों में है।

भगवान शिव की पूजा में बेलपत्र, शमी पत्र, धतूरा और आक जैसी सामग्री का इस्तेमाल भी क्षेत्रीय धार्मिक परंपराओं के अनुसार किया जाता है।

व्रत से जुड़ी मान्यताओं को कैसे समझें?

हरतालिका तीज के संबंध में लोक परंपराओं में कई मान्यताएं और कथाएं प्रचलित हैं। इनमें व्रत के दौरान नियम तोड़ने या कुछ खाद्य पदार्थों का सेवन करने से अगले जन्म में अलग-अलग रूप मिलने जैसी बातें भी कही जाती हैं।

इन बातों को धार्मिक और लोक-मान्यताओं के रूप में ही समझना चाहिए। इन्हें वैज्ञानिक तथ्य या प्रमाणित परिणाम के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।

हरतालिका तीज का मूल संदेश आस्था, तप, संकल्प और शिव-पार्वती के प्रति श्रद्धा से जुड़ा माना जाता है।

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