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व्हीलचेयर पर गई तो नहीं मिला एडमिशन: कानपुर DM ने कराया दाखिला, अब जज बनना है श्रेया का सपना

दिव्यांग छात्रा श्रेया को विश्वविद्यालय ने व्हीलचेयर पर देखकर किया इनकार, डीएम के आदेश पर मिला दाखिला; बचपन में गलत इंजेक्शन से खो बैठी दोनों पैर

कानपुर : ‘मेरी पढ़ाई के लिए पापा ने हमेशा लड़ाई लड़ी। अब जब यूनिवर्सिटी गए तो मुझे व्हीलचेयर पर देखकर एडमिशन देने से मना कर दिया गया। लेकिन पापा ने हार नहीं मानी और डीएम सर से मिले। उन्हीं की वजह से मेरा दाखिला हुआ।’

ये शब्द हैं 24 वर्षीय श्रेया शुक्ला के, जो दोनों पैरों से दिव्यांग हैं, लेकिन हौसलों से बुलंद। श्रेया अब एलएलएम (LLM) की पढ़ाई कर रही हैं और जज बनकर अपने पिता का सपना पूरा करना चाहती हैं।


???? व्हीलचेयर देख विवि ने किया इनकार

मंगलवार को श्रेया के पिता, वरिष्ठ अधिवक्ता लक्ष्मीकांत शुक्ला, शहर की एक प्रसिद्ध निजी यूनिवर्सिटी में अपनी बेटी का दाखिला कराने पहुँचे। पहले तो यूनिवर्सिटी प्रशासन ने फीस और कोर्स डिटेल्स बताईं, लेकिन जब उन्होंने श्रेया को व्हीलचेयर पर देखा, तो साफ कह दिया कि “हम दाखिला नहीं दे सकते।”

ये बात लक्ष्मीकांत शुक्ला को स्वीकार नहीं थी। उन्होंने गुरुवार को जिलाधिकारी (DM) कानपुर से संपर्क किया और अपनी बेटी के अधिकारों के लिए अपील की। DM ने तुरंत संज्ञान लिया और आदेश दिया कि 48 घंटे के भीतर श्रेया का दाखिला सुनिश्चित किया जाए।


???? DM को बताया ‘पिता समान’

श्रेया भावुक होकर कहती हैं,
“DM सर ने जिस तरह मामले को लिया, ऐसा लगा जैसे मैं उनकी खुद की बेटी हूं। मैं उन्हें पर्सनली थैंक्यू बोलना चाहती हूं। उनके बिना मेरा दाखिला संभव नहीं था।”


⚖ बचपन में हुई थी बड़ी चूक

श्रेया का जीवन बचपन से ही चुनौतियों से भरा रहा। उनके पिता लक्ष्मीकांत बताते हैं,
“वह मेरी इकलौती बेटी है। जब वो 5 साल की थी, तो एक बीमारी के इलाज के दौरान डॉक्टर ने गलत इंजेक्शन दे दिया। इसके बाद उसके दोनों पैरों में तकलीफ शुरू हुई, और धीरे-धीरे वह चलने-फिरने में अक्षम हो गई।”

हालांकि, इस दिव्यांगता ने श्रेया के सपनों को कभी कमजोर नहीं होने दिया। लाजपत नगर के एक प्रतिष्ठित स्कूल में वह हमेशा प्रथम श्रेणी से पास होती रहीं।


???? पढ़ाई में हमेशा रही अव्वल

इंटरमीडिएट के बाद साल 2019 में जब उन्होंने एक कॉलेज में एडमिशन के लिए आवेदन किया, तो वहां भी व्हीलचेयर देखकर मना कर दिया गया था। उस वक्त भी अधिकार की लड़ाई उन्हें लड़नी पड़ी थी।

अब जब वो कानून की पढ़ाई कर रही हैं, तो उनका सपना है — “एक दिन जज बनूं और समाज में समानता व न्याय की मिसाल पेश करूं।”


???? निष्कर्ष

श्रेया की कहानी सिर्फ एक संघर्ष नहीं, बल्कि उस भारत की तस्वीर है जहाँ अगर इरादे मजबूत हों और समाज में कुछ संवेदनशील अफसर हों — तो कोई भी बाधा आपकी राह नहीं रोक सकती।

News Desk

Written by News Desk

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