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न बालेन, न सुशीला, फिर कौन होगा नेपाल का मुखिया: 10 गुटों में बंटे GenZ, बोले- युवा पीएम चाहिए; सेना मुश्किल में किससे करे बात

काठमांडू में नेपाली सेना और GenZ प्रदर्शनकारियों के बीच दूसरा दौर की बातचीत विफल, 10 गुटों में बंटा आंदोलन; नई सरकार के गठन पर अनिश्चितता

काठमांडू: नेपाल में राजनीतिक संकट गहराता जा रहा है। 11 सितंबर को काठमांडू में नेपाली सेना हेडक्वार्टर पर दूसरे दौर की बातचीत होनी थी, जिसमें युवा आंदोलनकारी GenZ और नेपाली सेना के बीच बातचीत के जरिए अंतरिम सरकार के मुखिया का नाम तय किया जाना था। लेकिन स्थिति बेहद पेचीदा बन गई। जब युवा प्रदर्शनकारी विभिन्न GenZ गुटों में बंटकर आर्मी हेडक्वार्टर पहुंचे, तो बातचीत का माहौल तनावपूर्ण हो गया।

युवा पीढ़ी का विरोध और मांगें

GenZ आंदोलनकारी मान रहे हैं कि देश की वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था पूरी तरह से असफल हो चुकी है। उनका कहना है कि बालेन, सुशीला जैसे पुराने चेहरे नेपाल की समस्याओं का समाधान नहीं कर सकते। युवा पीढ़ी का स्पष्ट संदेश है – अब एक युवा प्रधानमंत्री की आवश्यकता है, जो देश को प्रगतिशील दिशा में ले जाए। विभिन्न गुटों में बंटे GenZ समूहों ने मिलकर एक स्वर में कहा कि यह समय बदलाव का है, और नया नेतृत्व जनमानस के भरोसे का पात्र होना चाहिए।

सेना और GenZ के बीच दूसरी बैठक

आर्मी हेडक्वार्टर में दूसरा दौर की बातचीत शुरू होने के बावजूद परिणाम अनिश्चित रहा। बातचीत में प्रमुख मुद्दा था – कौन बनेगा देश का अगला अंतरिम मुखिया। परस्पर गुटबाजी और असहमति के चलते बातचीत बेनतीजा रही। सेना ने भी स्पष्ट किया कि किसी गुट को पक्षपाती रूप से समर्थन नहीं दिया जाएगा। उन्होंने निष्पक्ष तरीके से सभी पक्षों की राय को समझने और स्थिति का समाधान निकालने का आश्वासन दिया।

राजनीतिक अनिश्चितता का आलम

नेपाल की राजनीतिक स्थिति अत्यंत अस्थिर है। एक ओर पुरानी व्यवस्था के प्रतिनिधि नेतृत्व करने में असमर्थ दिख रहे हैं, वहीं दूसरी ओर युवा पीढ़ी भी नए नेतृत्व के चयन में असहमति जता रही है। 10 अलग-अलग GenZ गुटों में बंटी इस नई पीढ़ी की आवाज ने राज्य प्रशासन को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है। जनतंत्र की स्थापना के बावजूद सत्ता संघर्ष का यह नया अध्याय संवैधानिक अस्थिरता को दर्शाता है।

भविष्य की राह

GenZ का मानना है कि नेपाल की प्रगति और सामाजिक समरसता तभी संभव है जब लोकतांत्रिक रीति-रिवाजों का पालन करते हुए देश का नया नेतृत्व चुना जाए। सेना के सामने चुनौती यह है कि वे किससे बात करें और किसको मध्यस्थता के लिए प्रमुख बनाएं। नेपाली जनता और अंतरराष्ट्रीय समुदाय भी इस बदलाव की प्रक्रिया पर बारीकी से नजर बनाए हुए हैं।

निष्कर्ष:

नेपाल का भविष्य संकट और आशा के बीच उलझा हुआ है। परंपरागत राजनीति की गिरावट और युवा नेतृत्व की आवाज ने देश को नए मोड़ पर ला खड़ा किया है। आगामी दिनों में अंतरिम सरकार के गठन का निर्णय न केवल नेपाली जनता के लिए, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया के लिए महत्वपूर्ण साबित होगा।

News Desk

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