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मकर संक्रांति से पहले लखनऊ का आसमान रंगीन, पतंगों से सजी नवाबी फिजा; हर छत बना उत्सव स्थल

छतों पर जुटी भीड़, गूंजा ‘वो काटा’, पीढ़ियों से चली आ रही पतंगबाजी की परंपरा फिर जीवंत

लखनऊ: मकर संक्रांति से पहले राजधानी लखनऊ का आसमान रंग-बिरंगी पतंगों से सज गया है। जैसे-जैसे पर्व नजदीक आ रहा है, वैसे-वैसे शहर की छतों पर रौनक बढ़ती जा रही है। हाथों में डोर, आंखों में जीत का जुनून और हवा में गूंजते ‘गद्दा मार… वो काटा’ के नारे पूरे शहर को उत्सव में बदल रहे हैं।

लखनऊ की गलियों और मोहल्लों में इन दिनों एक अलग ही जोश देखने को मिल रहा है। जैसे ही बरेली का तेज मांझा आगरा की मजबूत डोर से टकराता है, छतों पर खड़े लोग तालियां बजाकर जश्न मनाते हैं। यही कारण है कि लखनऊ को पतंगबाजी का विश्वविद्यालय कहा जाता है।


पतंगबाजी सिर्फ खेल नहीं, तहजीब की पहचान

लखनऊ में पतंग उड़ाना केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि तहजीब और परंपरा की पहचान है। हर कटती पतंग के साथ खुशियां उड़ती हैं और हर जीत पर छतों से जश्न बरसता है। मकर संक्रांति के दिन आसमान जितना रंगीन होता है, उतना ही जिंदादिल शहर नजर आता है।

यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है, जिसे आज भी उसी शिद्दत और लगाव के साथ निभाया जा रहा है।


नवाबों के दौर से चली आ रही परंपरा

देवराज सिंह बताते हैं कि लखनऊ में लगभग ढाई सौ साल से पतंगबाजी की परंपरा चली आ रही है। वे कहते हैं कि अपने बाबा के जमाने से यह शौक देखते आ रहे हैं। नवाबों की नगरी में पतंग उड़ाना एक खास दिन और तय नियमों के साथ होता था।

उन्होंने बताया कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भी पतंग उड़ाने के शौकीन रहे हैं। वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी पतंगबाजी करते हैं। इसके अलावा कई अन्य नेता भी इस परंपरा से जुड़े रहे हैं। पहले पतंगों पर दांव लगाए जाते थे, लाखों रुपये की शर्तें लगती थीं और जो पतंग काट लेता, वही इनाम का हकदार होता था।


चाइनीज मांझा बना चिंता का कारण

विकास चौहान बताते हैं कि उन्होंने आठ साल की उम्र से पतंग उड़ानी शुरू की और अब वे बारह साल के हो चुके हैं। वे पारंपरिक कागज, पानी और आधी-पौनी पतंगें उड़ाते हैं और सादी डोर का इस्तेमाल करते हैं।

उनका कहना है कि चाइनीज मांझा बेहद खतरनाक होता है, जिससे हादसों का डर बना रहता है। सादी डोर टूट भी जाए तो किसी को नुकसान नहीं होता, इसलिए इसका ही इस्तेमाल करना चाहिए।


तीन पीढ़ियों का शौक, भाईचारे की मिसाल

अजय वर्मा बताते हैं कि वे 47 साल के हैं और सात साल की उम्र से पतंग उड़ा रहे हैं। उनके बाबा, पिता और अब उनका बेटा—तीन पीढ़ियां इस शौक से जुड़ी हैं। वे मानते हैं कि यह शौक थोड़ा महंगा जरूर है, लेकिन इससे बेहतर कोई शौक नहीं।

उन्होंने युवाओं से अपील की कि मोबाइल फोन से बाहर निकलें और पतंगबाजी जैसे स्वस्थ शौक अपनाएं। पतंग उड़ाने में हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सभी साथ आते हैं, जिससे आपसी भाईचारा मजबूत होता है। यही लखनऊ की असली पहचान और परंपरा है।

मकर संक्रांति से पहले लखनऊ का आसमान सिर्फ पतंगों से नहीं, बल्कि उत्साह, परंपरा और भाईचारे के रंगों से भर गया है। पतंगबाजी आज भी नवाबी तहजीब को जिंदा रखे हुए है और यह परंपरा आने वाली पीढ़ियों तक यूं ही उड़ती रहेगी।

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