नई दिल्ली। लोकसभा में ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष पूरे होने पर सोमवार को विशेष चर्चा आयोजित की गई, जिसमें सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी राजनीतिक बहस देखने को मिली। चर्चा के दौरान कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी ने सवाल उठाते हुए कहा कि जब यह गीत 150 वर्षों से देश की आत्मा का हिस्सा है और 75 वर्षों से जनता के दिलों में बसा है, तो आज अचानक इस पर बहस की आवश्यकता क्यों पड़ी।
प्रियंका गांधी ने आरोप लगाया कि ‘वंदे मातरम्’ पर यह चर्चा किसी सांस्कृतिक भावना से नहीं, बल्कि राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित है। उन्होंने कहा कि इस बहस का मुख्य कारण पश्चिम बंगाल में आने वाले चुनाव हैं। उन्होंने कहा, “आप देश के लिए नहीं, बल्कि चुनाव के लिए काम कर रहे हैं।”
उन्होंने आगे कहा कि केंद्र सरकार स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों पर नए-नए आरोप थोपने का प्रयास कर रही है। उन्होंने यह भी कहा कि “मोदी जी अब वह प्रधानमंत्री नहीं रहे जो पहले थे।” प्रियंका गांधी ने आरोप लगाया कि सरकार अतीत में उलझी रहना चाहती है और वर्तमान समस्याओं से ध्यान भटकाने का प्रयास कर रही है।
इससे पहले चर्चा की शुरुआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की। उन्होंने अपने संबोधन में कांग्रेस पर हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि कांग्रेस ने ‘वंदे मातरम्’ को “टुकड़ों में बांटने” का काम किया। उन्होंने यह भी कहा कि जवाहरलाल नेहरू, मोहम्मद अली जिन्ना के सामने झुके थे। प्रधानमंत्री ने सवाल उठाया कि जब ‘वंदे मातरम्’ आजादी के समय प्रेरणा का स्रोत था, तो पिछले दशकों में इसके साथ “अन्याय” क्यों हुआ।
भाजपा सांसद अनुराग ठाकुर ने तीखे शब्दों में कहा कि ‘वंदे मातरम्’ राष्ट्रभक्तों के लिए ऊर्जा का स्रोत है, जबकि “कुछ लोगों को इससे एलर्जी है।” उन्होंने विवादित टिप्पणी करते हुए कहा कि “जिन्ना के मुन्ना” को भी वंदे मातरम् से समस्या है।
सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि जिस गीत ने आजादी के आंदोलन को जोड़ा, आज उसी के नाम पर देश को बांटने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने कहा कि ‘वंदे मातरम्’ सिर्फ गाने का नहीं, बल्कि निभाने का विषय है।
इतिहास का जिक्र करते हुए बताया गया कि ‘वंदे मातरम्’ की रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 7 नवंबर 1875 को की थी और इसे 1882 में उनके उपन्यास ‘आनंदमठ’ में प्रकाशित किया गया था। वर्ष 1896 में रवींद्रनाथ टैगोर ने पहली बार कांग्रेस अधिवेशन में इस गीत को सार्वजनिक रूप से गाया था।
प्रियंका गांधी ने नेहरू जी का बचाव करते हुए कहा कि अगर उन्होंने इसरो, डीआरडीओ और एम्स जैसी संस्थाओं की नींव नहीं रखी होती, तो आज देश वैज्ञानिक और चिकित्सीय क्षेत्र में आगे नहीं बढ़ पाता। उन्होंने यह भी कहा कि जितने साल नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री रहे हैं, लगभग उतने ही वर्ष नेहरू जेल में बिताए थे।
शिवसेना (UBT) सांसद अरविंद सावंत ने कहा कि कुछ संगठनों ने लंबे समय तक राष्ट्रीय ध्वज नहीं फहराया, लेकिन अब उन्हें राष्ट्रगीत से नया प्रेम जागा है। DMK सांसद ए. राजा ने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री भारत को “हिंदू राष्ट्र” बनाना चाहते हैं। वहीं टीएमसी सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने प्रधानमंत्री द्वारा बंकिम चंद्र को “बंकिम दा” कहे जाने पर आपत्ति जताई।
कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई ने कहा कि आज न वोट सुरक्षित हैं और न ही मतदाता, लेकिन सरकार इन मुद्दों पर चर्चा से बचती है। उन्होंने जांच एजेंसियों और संस्थानों की स्वतंत्रता पर भी सवाल उठाए।
कुल मिलाकर वंदे मातरम् के गौरवगान के बजाय यह चर्चा सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच राजनीतिक आरोप–प्रत्यारोप का मंच बन गई, जहाँ इतिहास, राष्ट्रवाद और चुनावी राजनीति के मुद्दे आमने–सामने आ गए।
लोकसभा में ‘वंदे मातरम्’ पर हुई बहस ने यह साफ कर दिया कि राष्ट्रगीत जैसे भावनात्मक विषय भी आज राजनीतिक टकराव का केंद्र बन चुके हैं। जहां सत्ता पक्ष इसे राष्ट्रवाद से जोड़कर देख रहा है, वहीं विपक्ष इसे चुनावी रणनीति और वास्तविक मुद्दों से ध्यान भटकाने वाला कदम बता रहा है। यह बहस आने वाले समय में राजनीतिक विमर्श का एक अहम विषय बनी रहेगी।


