नई दिल्ली। दीपावली का नाम सुनते ही मन में सबसे पहले अयोध्या नगरी, भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण की तस्वीर उभरती है। मान्यता है कि 14 वर्ष का वनवास पूरा करने और रावण पर विजय प्राप्त करने के बाद जब भगवान श्रीराम अयोध्या लौटे थे, तब नगरवासियों ने घी के दीपक जलाकर उनका भव्य स्वागत किया था। इसी खुशी में हर साल कार्तिक अमावस्या को दीपावली का त्योहार मनाया जाता है।
लेकिन क्या आप जानते हैं कि दीपावली का संबंध केवल भगवान श्रीराम की अयोध्या वापसी से ही नहीं है? इस पर्व के पीछे कई ऐसी धार्मिक और पौराणिक कथाएं भी हैं, जिनका उल्लेख अलग-अलग धार्मिक परंपराओं में मिलता है। माता लक्ष्मी के प्राकट्य से लेकर नरकासुर के वध और गुरु हरगोबिंद साहिब की रिहाई तक, दीपोत्सव का महत्व कई घटनाओं से जुड़ा हुआ है।
आइए जानते हैं दीपावली से जुड़ी ऐसी 6 महत्वपूर्ण कथाएं, जो इस त्योहार के धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व को और गहरा बनाती हैं।
1. भगवान श्रीराम की अयोध्या वापसी: दीपावली की सबसे प्रचलित कथा
दीपावली से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध मान्यता रामायण की कथा है। इसके अनुसार भगवान श्रीराम को पिता के वचन का पालन करते हुए 14 वर्षों का वनवास स्वीकार करना पड़ा था। इस दौरान माता सीता और भाई लक्ष्मण भी उनके साथ वन में रहे।
वनवास के दौरान लंकापति रावण ने माता सीता का हरण कर लिया था। इसके बाद भगवान श्रीराम ने हनुमान और वानर सेना की सहायता से लंका पर चढ़ाई की और रावण का वध करके माता सीता को मुक्त कराया।
वनवास की अवधि पूरी होने के बाद जब श्रीराम, सीता और लक्ष्मण अयोध्या लौटे तो पूरी नगरी उत्सव में डूब गई। लोगों ने अपने घरों और रास्तों पर दीपक जलाकर उनका स्वागत किया। इसी घटना को बुराई पर अच्छाई की जीत, धर्म की स्थापना और अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक माना जाता है।

2. नरकासुर का वध: छोटी दिवाली से जुड़ी है यह कहानी
दीपावली से ठीक एक दिन पहले मनाई जाने वाली छोटी दिवाली या नरक चतुर्दशी का संबंध भगवान श्रीकृष्ण और असुर नरकासुर की कथा से है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार नरकासुर एक शक्तिशाली असुर था, जिसने अपने अत्याचारों से देवताओं और आम लोगों को परेशान कर रखा था। उसने हजारों महिलाओं को बंदी बना लिया था। उसके बढ़ते अत्याचारों से परेशान होकर देवताओं ने भगवान श्रीकृष्ण से सहायता मांगी।
इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी पत्नी स
त्यभामा के साथ युद्ध करके नरकासुर का वध किया और बंदी बनाई गई महिलाओं को मुक्त कराया।
इस विजय को अन्याय और अत्याचार के अंत का प्रतीक माना जाता है। कई धार्मिक परंपराओं में नरक चतुर्दशी को इसी घटना की स्मृति में मनाया जाता है। यह कथा संदेश देती है कि शक्ति का उपयोग दूसरों को दबाने के लिए नहीं, बल्कि उनकी रक्षा और मुक्ति के लिए होना चाहिए।
3. समुद्र मंथन से हुआ था माता लक्ष्मी का प्राकट्य
दीपावली का संबंध धन, वैभव और समृद्धि की देवी माता लक्ष्मी से भी बेहद गहरा है। पौराणिक कथाओं के अनुसार देवताओं और असुरों ने अमृत प्राप्त करने के लिए क्षीरसागर का समुद्र मंथन किया था।
इस मंथन से कई दिव्य रत्न और बहुमूल्य वस्तुएं प्रकट हुईं। इन्हीं में एक थीं माता लक्ष्मी। मान्यता है कि माता लक्ष्मी कमल के फूल पर विराजमान होकर समुद्र से प्रकट हुई थीं। उनके प्राकट्य से चारों ओर दिव्यता और मंगल का वातावरण बन गया।
इसके बाद माता लक्ष्मी ने भगवान विष्णु को अपने पति के रूप में स्वीकार किया।
धार्मिक मान्यताओं में माता लक्ष्मी के प्राकट्य को कार्तिक अमावस्या की दीपावली से जोड़ा जाता है। इसी कारण इस दिन घरों में मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा की जाती है। लोगों का विश्वास है कि इस दिन विधि-विधान से पूजा करने और घर को स्वच्छ रखने से सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
4. गुरु हरगोबिंद साहिब की रिहाई: सिख धर्म में बंदी छोड़ दिवस
दीपावली का महत्व केवल हिंदू धार्मिक परंपराओं तक सीमित नहीं है। सिख धर्म में भी इस दिन का विशेष स्थान है। सिख समुदाय दीपावली के अवसर पर बंदी छोड़ दिवस मनाता है।
यह दिन सिखों के छठे गुरु, गुरु हरगोबिंद साहिब जी की ग्वालियर के किले से रिहाई की स्मृति से जुड़ा है। धार्मिक परंपरा के अनुसार उनके साथ 52 राजा भी कैद में थे। गुरु साहिब ने अपनी रिहाई के साथ उन राजाओं की मुक्ति का भी रास्ता बनाया।
जब गुरु हरगोबिंद साहिब अमृतसर पहुंचे तो उनके स्वागत में दीप जलाए गए और खुशियां मनाई गईं। इसी घटना की याद में बंदी छोड़ दिवस मनाया जाता है।
इस परंपरा का संदेश केवल आजादी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दूसरों को भी बंधनों से मुक्त कराने, मानवता और न्याय के पक्ष में खड़े होने की प्रेरणा देता है।
5. भगवान महावीर का निर्वाण: जैन धर्म में दीपावली का विशेष महत्व
जैन धर्म में भी दीपावली सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक पर्वों में से एक है। जैन मान्यताओं के अनुसार 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर ने कार्तिक अमावस्या के दिन बिहार के पावापुरी में निर्वाण प्राप्त किया था।
भगवान महावीर ने अपने जीवन में अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह और आत्मसंयम का संदेश दिया। उनके निर्वाण के बाद उनके अनुयायियों ने उनकी स्मृति में दीप जलाए।
जैन परंपरा में दीपावली केवल उत्सव का दिन नहीं, बल्कि आत्मज्ञान, आध्यात्मिक जागृति और मोक्ष की प्राप्ति का संदेश देने वाला अवसर है।
इस दिन जैन समुदाय भगवान महावीर के उपदेशों को याद करता है और उनके बताए मार्ग पर चलने का संकल्प लेता है।
6. राजा बलि और भगवान विष्णु की कथा: दीपावली के अगले दिन का महत्व
दीपावली से जुड़ी एक अन्य महत्वपूर्ण पौराणिक कथा राजा बलि और भगवान विष्णु के वामन अवतार की है।
मान्यता के अनुसार राजा बलि अपनी शक्ति, पराक्रम और दानवीरता के लिए प्रसिद्ध थे। उनके बढ़ते प्रभाव से देवता चिंतित हो गए। तब भगवान विष्णु ने वामन अवतार धारण किया और राजा बलि से तीन पग भूमि दान में मांगी।
राजा बलि ने उनकी मांग स्वीकार कर ली। इसके बाद भगवान वामन ने विराट रूप धारण करके पहले पग में पृथ्वी और दूसरे पग में स्वर्ग को नाप लिया। तीसरे पग के लिए कोई स्थान नहीं बचा तो राजा बलि ने अपना सिर आगे कर दिया।
भगवान विष्णु ने उन्हें पाताल लोक भेज दिया। कुछ धार्मिक मान्यताओं में राजा बलि को अपनी प्रजा से मिलने के लिए विशेष अवसर दिए जाने की कथा भी मिलती है। दीपावली के अगले दिन मनाई जाने वाली बलि प्रतिपदा का संबंध इसी परंपरा से जोड़ा जाता है।
दीपावली का असली संदेश क्या है?
इन सभी कथाओं को देखने पर स्पष्ट होता है कि दीपावली केवल दीप जलाने, मिठाइयां बांटने और नए कपड़े पहनने का त्योहार नहीं है। इसके पीछे प्रकाश, ज्ञान, स्वतंत्रता, न्याय, समृद्धि और बुराई पर अच्छाई की जीत जैसे अनेक संदेश छिपे हैं।
कहीं भगवान श्रीराम की वापसी की खुशी है, तो कहीं भगवान कृष्ण द्वारा अत्याचार के अंत की कथा। कहीं माता लक्ष्मी के प्राकट्य का उत्सव है, तो कहीं गुरु हरगोबिंद साहिब की रिहाई और भगवान महावीर के निर्वाण की स्मृति।
यही वजह है कि दीपावली अलग-अलग धार्मिक परंपराओं में अलग-अलग अर्थ और महत्व के साथ मनाई जाती है।

