Pilibhit News: कुपोषण और टीबी से जूझते बच्चों को दी जिंदगी

Pilibhit News: चार साल का बच्चा और वजन मात्र सात किलोग्राम…हाथ-पैर बेहद कमजोर…दो कदम चलना भी दूभर। पूरनपुर का सोहिल (बदला नाम) अति कुपोषण का शिकार था। कुपोषण के कारण ही ट्यूबरक्लोसिस ने भी जकड़ लिया। बाप के लिए दो जून की रोटी भी जुटाना मुश्किल था…। दवा क्या करा पाता। मां बच्चे को जिला अस्पताल स्थित पोषण पुनर्वास केंद्र (एनआरसी) लेकर आई। यहां बच्चे को नई जिंदगी मिल गई। अच्छा आहार पाया तो कुपोषण खत्म। टीबी का इलाज चल रहा है।
सोहिल और उसके तीन साल के भाई हसनैन को पुनर्जीवन देने का काम किया है एनआरसी की डा. नीता ने। चिकित्सक ने बच्चे का इलाज तो किया ही, साथ ही उस परिवार की आर्थिक मदद भी की। पूरनपुर के कल्यानपुर गांव की हसीना (बदला नाम) ने बताया कि उसका पति मजदूरी करता है। कुछ पैसे जोड़कर उसने निजी अस्पताल में बच्चों का इलाज कराया, लेकिन सुधार नहीं हुआ। आर्थिक तंगी के चलते आगे इलाज नहीं करा सकी। सौभाग्य से एनआरसी ले लाई और यहां बच्चों को जिंदगी मिल गई। डॉ. नीता ने बच्चों को भर्ती करके इलाज शुरू किया। चिकित्सक व पूरे स्टाफ ने इलाज के साथ ही उनके खाने-पीने से लेकर दवाओं तक की जिम्मेदारी ली। चौदह दिनों तक एनआरसी में इलाज और सही डाइट व सेवा से बच्चों में कुछ सुधार हुआ लेकिन पूरी तरह से ठीक नहीं हुए। 14 दिनों के लिए और एनआरसी में रखा क्योंकि दोनों बच्चों को टीबी भी थी। पूरनपुर सीएचसी से टीबी की दवा जारी है। पोषणयुक्त भोजन और दवाइयों से व सही देखभाल से दोनों बच्चे अब ठीक हैं। डॉ. नीता ने बताया कि चार वर्ष के बच्चे का वजन करीब चौदह किलो तक रहता है और वह चलना भी शुरू कर देता है, लेकिन सोहिल का वजन मात्र 7.5 किलोग्राम था। दोनों बच्चे कुछ खा भी नहीं पा रहे थे। शुरू में दोनों बच्चों को पाइप की मदद से खाना खिलाया गया। दवाओं और बेहतर खानपान से बच्चों का वजन दो माह में लगभग चार किलो तक बढ़ गया। जो बच्चा हिल-डुल नहीं पा रहा था, वह खेलने लगा। उन्होंने बताया कि माता-पिता की आर्थिक तंगी को देखते हुए बच्चे को जिला अस्पताल के पोषण पुनर्वास केंद्र में जितने कर्मचारी हैं, वह पोषण से संबंधित चीजें भेजते हैं, ताकि बच्चे को सही पोषण आहार मिल सके और काउंसलिंग भी करते रहते हैं। डॉ. नीता ने बताया कि चार माह पूर्व एनआरसी में भर्ती हुए इन अति कुपोषित बच्चों की जांच होने पर टीबी भी निक़ली। दो महीनों से इन बच्चों को जिला क्षयरोग केंद्र से पोषण किट दी जा रही है। डीटीओ सेंटर के एक कर्मचारी ने दोनों बच्चों को गोद ले लिया है जिससे उन बच्चों को सही पोषण और देखभाल मिल रही है। उप जिला क्षयरोग अधिकारी पारूल मित्तल ने बताया कि अगर बच्चों में तेज बुखार, भूख न लगना, कमजोर होना, रात में सोते समय पसीना आना जैसे लक्षण दिखाई दें तो तुरंत बच्चे की जांच कराएं जिससे स्पष्ट हो सके कि बच्चे को टीबी तो नहीं है। अगर जांच में टीबी की पुष्टि होती है तो तुरंत क्षयरोग केंद्र के संपर्क में आकर इलाज शुरू करा देना चाहिए।
दस महीनों में 203 कुपोषित बच्चों को किया ठीक
डॉ. नीता ने बताया कि एनआरसी में छः महीने से पांच साल तक के बच्चे आते हैं । पिछले दस महीनों में यहां 219 बच्चे एडमिट हुए। इनमें से कुछ बच्चे अतिकुपोषित और कुछ बच्चे कुपोषण का शिकार थे। इनमें से 203 बच्चे सुपोषित होकर निकले। सात बच्चों को हायर सेंटर भेजा गया। शेष सभी बच्चे स्वस्थ हैं। उन्होंने बताया कि ओपीडी या फिर गांव से जो भी बच्चे आते हैं, उनकी जांच और दवाएं फ्री में की जाती हैं। इसके अलावा केन्द्र से जाने के बाद नियमित रूप से उनकी मानीटरिंग की जाती है। 15-15 दिन के अंतराल पर बच्चों को जांच और दवाएं दी जाती हैं।
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