अमेठी: उत्तर प्रदेश की राजनीति में विधानसभा चुनाव 2027 से पहले बड़ा घटनाक्रम सामने आ रहा है। समाजवादी पार्टी से बागी हुए तीन विधायक बुधवार, 14 अक्टूबर को भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ग्रहण करने जा रहे हैं। इनमें गौरीगंज से विधायक राकेश प्रताप सिंह, अयोध्या जिले की गोसाईगंज सीट से विधायक अभय सिंह और जालौन की कालपी सीट से विधायक विनोद चतुर्वेदी शामिल हैं।
अमेठी के गौरीगंज में होने वाले सदस्यता ग्रहण कार्यक्रम को लेकर तैयारियां की गई हैं। इस कार्यक्रम में भाजपा की राष्ट्रीय महामंत्री स्मृति ईरानी, प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी और राज्य सरकार के कई वरिष्ठ नेताओं के शामिल होने की जानकारी सामने आई है।
तीनों विधायकों के भाजपा में जाने से उत्तर प्रदेश की राजनीति में नई चर्चा शुरू हो गई है। इसे आगामी विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा की राजनीतिक और संगठनात्मक रणनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है।
राकेश प्रताप सिंह की सपा से क्यों बढ़ी दूरी?
राकेश प्रताप सिंह गौरीगंज विधानसभा सीट से लगातार तीन बार समाजवादी पार्टी के टिकट पर चुनाव जीत चुके हैं। वर्ष 2012, 2017 और 2022 में जीत दर्ज करने वाले राकेश प्रताप सिंह की सपा नेतृत्व से दूरियां पिछले कुछ वर्षों में बढ़ती गईं।
रामचरितमानस और धार्मिक मुद्दों पर स्वामी प्रसाद मौर्य की टिप्पणियों के विरोध में राकेश प्रताप सिंह ने खुलकर अपनी बात रखी थी। इसके बाद पार्टी नेतृत्व के साथ उनके मतभेद लगातार चर्चा में रहे।
वर्ष 2024 के राज्यसभा चुनाव में भाजपा प्रत्याशी के पक्ष में क्रॉस-वोटिंग करने और पार्टी लाइन से अलग रुख अपनाने के बाद उनका सपा से टकराव और बढ़ गया। पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में समाजवादी पार्टी ने जून 2025 में उन्हें निष्कासित कर दिया था।
इसके बाद भी राकेश प्रताप सिंह की राजनीतिक गतिविधियां जारी रहीं। उन्होंने अयोध्या स्थित राम मंदिर तक पदयात्रा निकाली और भाजपा के कई कार्यक्रमों तथा नेताओं के साथ उनकी नजदीकियां सामने आती रहीं।

रामचरितमानस और राष्ट्र के मुद्दे पर दिया बड़ा बयान
भाजपा में शामिल होने के फैसले को लेकर राकेश प्रताप सिंह ने अपनी राजनीतिक सोच और प्राथमिकताओं का उल्लेख किया है। उन्होंने कहा कि जहां भगवान राम के अस्तित्व पर सवाल उठाए जाएं और रामचरितमानस को लेकर विवादित टिप्पणियां हों, वहां उनके लिए राजनीति करना मुश्किल है।
उन्होंने सपा पर परिवारवाद और जातिवाद को बढ़ावा देने का आरोप भी लगाया है। राकेश प्रताप सिंह के मुताबिक, वह राष्ट्र और राम के मुद्दे पर भाजपा के साथ खड़े होना चाहते हैं।
हालांकि, उनके इस फैसले को केवल वैचारिक मतभेद तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। आगामी विधानसभा चुनाव, क्षेत्रीय समीकरण और राजनीतिक संगठन में उनकी भूमिका भी इस बदलाव के महत्वपूर्ण पहलू हैं।
अभय सिंह और विनोद चतुर्वेदी भी बदलेंगे राजनीतिक पाला
राकेश प्रताप सिंह के साथ भाजपा में शामिल होने जा रहे अभय सिंह और विनोद चतुर्वेदी भी राज्यसभा चुनाव के दौरान सपा से अलग रुख अपनाने वाले विधायकों में शामिल रहे हैं।
अभय सिंह अयोध्या जिले की गोसाईगंज विधानसभा सीट का प्रतिनिधित्व करते हैं, जबकि विनोद चतुर्वेदी जालौन जिले की कालपी सीट से विधायक हैं। दोनों के भाजपा में शामिल होने से पार्टी को अलग-अलग क्षेत्रों में अपने राजनीतिक संपर्क और संगठनात्मक आधार को मजबूत करने का अवसर मिल सकता है।
हालांकि, किसी विधायक के दल बदलने से चुनावी जीत सुनिश्चित नहीं होती। आगामी चुनाव में स्थानीय मुद्दे, उम्मीदवारों की लोकप्रियता, संगठन की सक्रियता और मतदाताओं का रुख निर्णायक होंगे।
स्मृति ईरानी की मौजूदगी क्यों है खास?
अमेठी में आयोजित सदस्यता ग्रहण कार्यक्रम में स्मृति ईरानी की मौजूदगी को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अमेठी से उनका पुराना राजनीतिक जुड़ाव रहा है और जिले में भाजपा संगठन की गतिविधियों पर उनकी भूमिका चर्चा में रहती है।
कार्यक्रम में भाजपा प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी सहित अन्य वरिष्ठ नेताओं के भी शामिल होने की संभावना है। गौरीगंज में बड़े आयोजन की तैयारियां की गई हैं, जहां स्थानीय जनप्रतिनिधियों और पार्टी कार्यकर्ताओं के जुटने की उम्मीद है।
रिपोर्टों के मुताबिक, अमेठी जिले के कई ग्राम प्रधानों, क्षेत्र पंचायत सदस्यों और अन्य स्थानीय नेताओं के भी भाजपा में शामिल होने का दावा किया गया है। हालांकि, ऐसे दावों की वास्तविक संख्या और राजनीतिक प्रभाव का आकलन कार्यक्रम के बाद ही किया जा सकेगा।
क्या 2027 में भाजपा को मिलेगा राजनीतिक फायदा?
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा और समाजवादी पार्टी दोनों अपने संगठन और राजनीतिक आधार को मजबूत करने में जुटी हैं। ऐसे समय में तीन विधायकों का भाजपा में शामिल होना सपा के लिए राजनीतिक चुनौती बन सकता है।
राकेश प्रताप सिंह का गौरीगंज में स्थानीय प्रभाव रहा है। ऐसे में भाजपा को उम्मीद हो सकती है कि उनके साथ आने से क्षेत्र में संगठनात्मक मजबूती मिलेगी। वहीं, सपा के सामने अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों में नए उम्मीदवारों और कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने की चुनौती होगी।
हालांकि, इन विधायकों के भाजपा में आने से कितने मतदाताओं का समर्थन पार्टी को मिलेगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है। चुनावी नतीजे स्थानीय समीकरणों और जनता के फैसले पर निर्भर करेंगे।


