नई दिल्ली: देश की राजधानी दिल्ली में विरोध प्रदर्शन करने वालों के लिए एक बड़ा बदलाव सामने आया है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर को अधिकृत प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटा दिया है। अब यहां पहले की तरह धरना-प्रदर्शन आयोजित करने की अनुमति नहीं होगी। नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल है कि अगर कोई राजनीतिक दल, संगठन या आम नागरिक जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने पहुंचता है, तो उसे कितनी सजा हो सकती है और क्या सीधे जेल भेजा जा सकता है?
इस मुद्दे ने उस समय और तूल पकड़ लिया, जब कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेता सौरव दास और आशुतोष रांका को जंतर-मंतर पर पहुंचने और प्रतिबंधित स्थल में प्रवेश करने की कोशिश के मामले में हिरासत में लिया गया। दोनों को पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेजे जाने की खबर के बाद प्रदर्शन की अनुमति और कानूनी कार्रवाई को लेकर बहस तेज हो गई है।
जंतर-मंतर पर आखिर क्यों लगी रोक?
जंतर-मंतर लंबे समय से राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और विभिन्न जनसमूहों के विरोध प्रदर्शनों का प्रमुख केंद्र रहा है। यहां अलग-अलग मुद्दों पर धरने और आंदोलन आयोजित किए जाते रहे हैं। हालांकि, प्रदर्शन के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखने और वैकल्पिक स्थान उपलब्ध कराने का सवाल लंबे समय से चर्चा में था।
9 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने प्रदर्शन के लिए उपयुक्त वैकल्पिक स्थलों की पहचान करने की आवश्यकता पर जोर दिया। इसके बाद दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर को अधिकृत प्रदर्शन स्थल की सूची से हटा दिया। पुलिस ने रामलीला मैदान, बुराड़ी ग्राउंड और पूर्वी दिल्ली के सीबीडी ग्राउंड को वैकल्पिक स्थलों के रूप में चिह्नित किया है।
इस बदलाव का मतलब यह नहीं है कि दिल्ली में हर प्रकार के विरोध प्रदर्शन पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया है। इसके बजाय, प्रदर्शन आयोजित करने के लिए निर्धारित स्थानों और अनुमति संबंधी नियमों का पालन करना जरूरी होगा।

जंतर-मंतर पहुंचने पर क्या हो सकती है कार्रवाई?
दिल्ली पुलिस के नए आदेश के बाद जंतर-मंतर पर बिना अनुमति प्रदर्शन करने या प्रतिबंधित क्षेत्र में प्रवेश करने की कोशिश करने वालों को कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है। कार्रवाई इस बात पर निर्भर करेगी कि व्यक्ति ने किस आदेश का उल्लंघन किया, उसकी भूमिका क्या थी और घटनास्थल पर क्या परिस्थितियां थीं।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 के तहत सक्षम अधिकारी कुछ परिस्थितियों में निषेधाज्ञा जारी कर सकते हैं। यदि ऐसी किसी वैध निषेधाज्ञा का उल्लंघन होता है, तो भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 223 के तहत कार्रवाई हो सकती है।
इस अपराध में परिस्थितियों के आधार पर एक महीने तक की कैद या जुर्माना अथवा दोनों हो सकते हैं। यदि आदेश की अवहेलना से मानव जीवन, स्वास्थ्य या सुरक्षा को खतरा पैदा होता है अथवा दंगा होने की आशंका बनती है, तो सजा छह महीने तक की कैद और जुर्माने तक पहुंच सकती है।
हालांकि, यह समझना जरूरी है कि केवल जंतर-मंतर पहुंच जाने से हर व्यक्ति को अपने आप जेल की सजा नहीं हो जाती। गिरफ्तारी, आरोप और सजा अलग-अलग कानूनी प्रक्रियाएं हैं। किसी व्यक्ति के खिलाफ कौन-सा प्रावधान लागू होगा, यह मामले के तथ्यों पर निर्भर करेगा।
गैरकानूनी जमावड़े पर कितनी सजा?
यदि लोग किसी वैध आदेश का उल्लंघन करते हुए गैरकानूनी जमावड़ा बनाते हैं, तो उनके खिलाफ BNS के संबंधित प्रावधानों के तहत कार्रवाई हो सकती है। गैरकानूनी जमावड़े से जुड़े सामान्य अपराध में छह महीने तक की कैद, जुर्माना या दोनों का प्रावधान हो सकता है।
यदि समूह के सदस्य घातक हथियार लेकर आते हैं या हिंसा में शामिल होते हैं, तो मामला अधिक गंभीर हो सकता है। इसी तरह, पुलिस की कार्रवाई में बाधा डालना, बैरिकेड तोड़ना या सरकारी कर्मचारियों के साथ बल प्रयोग करना अलग-अलग अपराधों के अंतर्गत कार्रवाई का कारण बन सकता है।
इसलिए प्रदर्शनकारियों के लिए केवल भीड़ इकट्ठा करना ही नहीं, बल्कि प्रशासन के आदेशों और निर्धारित शर्तों का पालन करना भी महत्वपूर्ण है।
पुलिस से भिड़ना पड़ सकता है भारी
प्रदर्शन के दौरान यदि कोई व्यक्ति पुलिसकर्मियों को उनके कर्तव्य का निर्वहन करने से रोकता है, तो BNS की धारा 221 सहित लागू कानूनी प्रावधानों के तहत मामला दर्ज हो सकता है। वहीं, लोक सेवक पर हमला करने या उसे कर्तव्य से रोकने के लिए आपराधिक बल का इस्तेमाल करने पर अधिक गंभीर धाराएं लागू हो सकती हैं।
ऐसे मामलों में सजा अपराध की प्रकृति और संबंधित कानूनी प्रावधान पर निर्भर करती है। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि हर प्रदर्शनकारी को एक जैसी सजा मिलेगी या सभी मामलों में जमानत नहीं मिलेगी।
यदि किसी व्यक्ति को गिरफ्तार किया जाता है, तो उसे कानून के तहत उपलब्ध अधिकार और न्यायिक प्रक्रिया का लाभ मिलता है। जमानत मिलेगी या नहीं, इसका फैसला लागू अपराधों, कानूनी शर्तों और अदालत के आकलन पर निर्भर करता है।
सौरव दास और आशुतोष रांका की गिरफ्तारी से क्यों बढ़ी चर्चा?
जंतर-मंतर पर रोक लागू होने के बाद CJP नेताओं सौरव दास और आशुतोष रांका के वहां पहुंचने का मामला चर्चा में आ गया। पुलिस के अनुसार, दोनों ने प्रतिबंधित प्रदर्शन स्थल में प्रवेश करने की कोशिश की और इससे कानून-व्यवस्था की स्थिति प्रभावित होने की आशंका थी।
इसके बाद दोनों को हिरासत में लिया गया और पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। इस कार्रवाई को लेकर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी सामने आईं। विपक्ष के नेताओं ने प्रदर्शन के अधिकार और प्रशासनिक कार्रवाई पर सवाल उठाए।
यह मामला इस बात की ओर ध्यान दिलाता है कि सार्वजनिक स्थानों पर प्रदर्शन करने के अधिकार और कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी के बीच संतुलन बनाए रखना कितना महत्वपूर्ण है।
अब कहां कर सकेंगे विरोध प्रदर्शन?
दिल्ली में प्रदर्शन करने के इच्छुक लोगों के लिए रामलीला मैदान, बुराड़ी ग्राउंड और सीबीडी ग्राउंड को वैकल्पिक स्थलों के रूप में चिह्नित किया गया है। हालांकि, इन स्थानों पर भी प्रदर्शन करने से पहले पुलिस की अनुमति, निर्धारित शर्तों और संबंधित प्रशासनिक निर्देशों की जानकारी लेना जरूरी होगा।
आयोजकों को कार्यक्रम की तारीख, संभावित भीड़, सुरक्षा व्यवस्था और यातायात पर पड़ने वाले प्रभाव जैसे पहलुओं पर ध्यान देना चाहिए। अनुमति मिलने के बाद भी तय शर्तों का उल्लंघन करने पर कार्रवाई हो सकती है।
कुल मिलाकर, जंतर-मंतर को अधिकृत प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाए जाने के बाद दिल्ली में धरना-प्रदर्शन की व्यवस्था बदल गई है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि नागरिकों का शांतिपूर्ण विरोध करने का संवैधानिक अधिकार समाप्त हो गया है। अब लोगों के लिए जरूरी है कि वे निर्धारित स्थानों पर, कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए अपनी बात रखें।


