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गोल्डन टेंपल पहुंचे हंसराज हंस का सियासत पर बड़ा संदेश: “सचखंड में आएं तो पहचान और राजनीति बाहर छोड़ आएं”

पंजाबी सूफी: गायकी की पहचान और पूर्व भाजपा सांसद हंसराज हंस शुक्रवार को अमृतसर पहुंचे, जहां उन्होंने श्रद्धा और भक्ति भाव से स्वर्ण मंदिर (सचखंड श्री हरमंदिर साहिब) में मत्था टेका। गुरुघर में नतमस्तक होकर उन्होंने वाहेगुरु का शुकराना अदा किया और कहा कि यहां आकर जो आत्मिक सुकून मिलता है, वह अनमोल है।

सचखंड में आत्मिक शांति का अनुभव

गुरुद्वारा परिसर में प्रवेश करते ही हंसराज हंस कुछ देर सरोवर के किनारे बैठे रहे। उन्होंने अरदास की और गुरुबाणी का श्रवण किया। मीडिया से बातचीत में उन्होंने कहा, “दुनिया में इंसान बहुत कुछ हासिल करने की दौड़ में लगा रहता है। नाम, शोहरत, पहचान—सब कुछ। मगर यहां आकर जो आत्मिक शांति मिलती है, उसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता।”

उन्होंने कहा कि यह दुनिया के सबसे पवित्र स्थलों में से एक है, जहां इंसान अपने अहंकार, चिंता और तनाव को बाहर छोड़कर आता है। “यहां आकर मन झुकता है, आत्मा को सुकून मिलता है और जीवन की असली दिशा समझ आती है,” उन्होंने जोड़ा।

सियासत पर स्पष्ट संदेश

हंसराज हंस ने अपने बयान में राजनीति को लेकर भी साफ संदेश दिया। उन्होंने कहा, “अगर यहां आकर भी राजनीति करनी है, तो फिर आने का क्या फायदा? जब भी सचखंड में आएं, अपनी पहचान और सियासत दोनों बाहर छोड़कर आएं।”

उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब धार्मिक स्थलों पर राजनीतिक गतिविधियों को लेकर अक्सर बहस होती रहती है। हंस ने कहा कि गुरुघर की मर्यादा सर्वोपरि है और हर व्यक्ति, चाहे वह आम श्रद्धालु हो या बड़ा नेता, उसे इस पवित्र स्थान की गरिमा का सम्मान करना चाहिए।

उन्होंने बाकी नेताओं को भी नसीहत दी कि धार्मिक स्थलों को राजनीतिक मंच न बनाएं। “यहां इंसान को केवल भक्त बनकर आना चाहिए, नेता बनकर नहीं,” उन्होंने कहा।

संगीत से आध्यात्म तक का सफर

हंसराज हंस का नाम पंजाबी सूफी संगीत की दुनिया में बड़े सम्मान से लिया जाता है। ‘नच ले वे’, ‘दिल चोरी साडा हो गया’ जैसे लोकप्रिय गीतों के अलावा उनकी सूफी गायकी ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई। उन्होंने बताया कि उनका रिश्ता केवल सियासत से नहीं, बल्कि संगीत और अध्यात्म से भी गहराई से जुड़ा है।

उन्होंने कहा, “मैं अक्सर चुपचाप, बिना किसी प्रचार के यहां मत्था टेकने आता रहता हूं। गुरुघर में बैठकर जो ऊर्जा मिलती है, वह मुझे फिर से जीवन की राह पर मजबूती से चलने की ताकत देती है।”

दरबार साहिब की मर्यादा

स्वर्ण मंदिर, जिसे सचखंड श्री हरमंदिर साहिब भी कहा जाता है, सिख धर्म का सबसे पवित्र तीर्थस्थल है। यहां रोजाना हजारों श्रद्धालु देश-विदेश से पहुंचते हैं। गुरुबाणी की स्वर लहरियां, सरोवर की शांति और लंगर की सेवा—यह सब मिलकर एक ऐसा वातावरण बनाते हैं, जो हर आगंतुक के मन को छू जाता है।

हंसराज हंस ने कहा कि यहां आकर उन्हें हमेशा नई प्रेरणा मिलती है। “यह केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि मानवता का केंद्र है। यहां कोई छोटा-बड़ा नहीं, सब बराबर हैं,” उन्होंने कहा।

राजनीतिक और सामाजिक संदर्भ

एक समय भाजपा सांसद रहे हंसराज हंस का यह बयान राजनीतिक हलकों में भी चर्चा का विषय बन गया है। हालांकि उन्होंने किसी विशेष दल या व्यक्ति का नाम नहीं लिया, लेकिन उनका संदेश स्पष्ट था—धार्मिक स्थलों की गरिमा बनाए रखना सभी की जिम्मेदारी है।

विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे बयान सामाजिक समरसता को बढ़ावा देते हैं। धार्मिक स्थलों पर एकता और शांति का संदेश ही प्रमुख होना चाहिए।

श्रद्धालुओं के बीच सादगी

गोल्डन टेंपल परिसर में हंसराज हंस पूरी सादगी के साथ नजर आए। उन्होंने आम श्रद्धालुओं की तरह ही कतार में लगकर दर्शन किए और लंगर में भी हिस्सा लिया। उनके साथ मौजूद कुछ प्रशंसकों ने तस्वीरें भी खिंचवाईं, लेकिन उन्होंने इसे निजी और आध्यात्मिक यात्रा बताया।

आध्यात्मिक ऊर्जा की तलाश

हंसराज हंस ने कहा कि जीवन की भागदौड़ में अक्सर इंसान खुद को खो देता है। “जब भी मन अशांत होता है, मैं यहां आ जाता हूं। यहां की वाइब्रेशन, गुरुबाणी की धुन और सेवा का भाव मन को स्थिर कर देता है,” उन्होंने कहा।

उन्होंने युवाओं को भी संदेश दिया कि वे अपनी जड़ों से जुड़े रहें और आध्यात्मिक मूल्यों को समझें।

अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में हंसराज हंस की यह यात्रा केवल एक धार्मिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि आध्यात्मिक संदेश भी थी। उन्होंने स्पष्ट कहा कि सचखंड में आकर पहचान और राजनीति को बाहर छोड़ देना चाहिए। उनका यह संदेश धार्मिक स्थलों की गरिमा और शांति को बनाए रखने की अपील है।

गुरुघर में मिली आत्मिक शांति और नई ऊर्जा के साथ हंसराज हंस ने एक बार फिर यह दिखाया कि आस्था, संगीत और विनम्रता—इन तीनों का संगम ही उनके व्यक्तित्व की असली पहचान है।

News Desk

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