कानपुर: उत्तर प्रदेश के कानपुर से अस्पताल और स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़ा एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने सोशल मीडिया पर लोगों का ध्यान खींच लिया है। कल्याणपुर के एहसास अस्पताल में काम करने वाले एक वार्डबॉय के नाम से ऐसे पोस्टर सोशल मीडिया पर वायरल हुए, जिनमें उसे MBBS चिकित्सक और ICU स्पेशलिस्ट के तौर पर पेश किया गया। पोस्टर वायरल होने के बाद अस्पताल की कार्यप्रणाली और संबंधित व्यक्ति की भूमिका को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, नए शिवली रोड स्थित एहसास अस्पताल में कृष्ण मोहन वार्डबॉय के तौर पर काम करता है। शनिवार देर रात उसके सोशल मीडिया अकाउंट से दो पोस्टर तेजी से वायरल होने लगे। इन पोस्टरों में कृष्ण मोहन को MBBS डॉक्टर बताया गया था। इतना ही नहीं, पोस्टर में उसे ICU स्पेशलिस्ट के तौर पर भी पेश किया गया और अस्पताल की विभिन्न सुविधाओं का प्रचार किया गया।
पोस्टर में खुद को बताया MBBS डॉक्टर
मामला तब चर्चा में आया जब सोशल मीडिया पर वायरल हुए पोस्टरों को लोगों ने साझा करना शुरू किया। पोस्टर में कृष्ण मोहन की तस्वीर और नाम के साथ उसकी पेशेवर पहचान डॉक्टर के रूप में दिखाई गई थी।
सबसे बड़ा सवाल यही उठा कि अगर संबंधित व्यक्ति अस्पताल में वार्डबॉय के रूप में काम करता है, तो उसके नाम से MBBS डॉक्टर और ICU स्पेशलिस्ट का प्रचार कैसे हुआ? सोशल मीडिया पर पोस्टर वायरल होने के बाद स्थानीय स्तर पर इस मामले को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गईं।
हालांकि, पोस्टर के आधार पर किसी व्यक्ति की वास्तविक शैक्षणिक योग्यता या चिकित्सकीय पंजीकरण के बारे में अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। इसके लिए संबंधित दस्तावेज और आधिकारिक रिकॉर्ड की पुष्टि जरूरी होगी।

वार्डबॉय ने बताई अलग कहानी
पोस्टर वायरल होने के बाद जब कृष्ण मोहन से इस संबंध में जानकारी ली गई तो उसने कथित तौर पर इसे गलती से शेयर हुआ पोस्टर बताया। यानी उसका कहना है कि उसने जानबूझकर खुद को MBBS डॉक्टर बताकर प्रचार नहीं किया।
अब जांच का अहम सवाल यह है कि पोस्टर तैयार किसने किया था, उसमें MBBS और ICU स्पेशलिस्ट जैसी जानकारी किस आधार पर डाली गई और वह पोस्टर कृष्ण मोहन के सोशल मीडिया अकाउंट तक कैसे पहुंचा।
इन सवालों के जवाब सामने आने के बाद ही मामले की पूरी तस्वीर स्पष्ट हो सकेगी।
अस्पताल संचालक की भूमिका पर भी उठे सवाल
पोस्टर वायरल होने के बाद स्थानीय लोगों के बीच अस्पताल संचालक की भूमिका को लेकर भी चर्चा शुरू हो गई। रिपोर्ट में लोगों के हवाले से यह सवाल उठाया गया कि क्या अस्पताल के प्रचार या किसी अन्य उद्देश्य से वार्डबॉय के नाम से ऐसा पोस्टर तैयार कराया गया था।
हालांकि, यह केवल चर्चा और सवालों का विषय है। अस्पताल संचालक योगेंद्र यादव से इस मामले पर प्रतिक्रिया लेने का प्रयास किए जाने की बात रिपोर्ट में कही गई है, लेकिन उनका पक्ष उपलब्ध नहीं हो सका। इसलिए उनकी ओर से किसी भूमिका या सहमति का निष्कर्ष निकालना अभी उचित नहीं होगा।
अस्पतालों की निगरानी को लेकर फिर सवाल
कानपुर के कल्याणपुर क्षेत्र में बड़ी संख्या में निजी अस्पताल संचालित होने के कारण स्वास्थ्य सेवाओं की निगरानी को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। ताजा मामला सामने आने के बाद फिर यह चर्चा शुरू हो गई है कि निजी अस्पतालों में काम करने वाले कर्मचारियों की जिम्मेदारियों और पेशेवर पहचान की निगरानी कितनी सख्ती से होती है।
किसी व्यक्ति का खुद को डॉक्टर बताना केवल प्रचार का मामला नहीं है। अगर कोई गैर-पंजीकृत व्यक्ति वास्तव में डॉक्टर के रूप में मरीजों का इलाज या दवा लिखता है, तो यह मरीजों की सुरक्षा से जुड़ा गंभीर विषय बन सकता है।
हालांकि, मौजूदा मामले में कृष्ण मोहन द्वारा मरीजों का इलाज करने या दवा लिखने की पुष्टि इस रिपोर्ट में नहीं हुई है। उपलब्ध जानकारी पोस्टर और उसकी सोशल मीडिया पोस्ट तक सीमित है।
कुछ दिन पहले कानपुर में सामने आया था दूसरा मामला
दिलचस्प बात यह है कि कानपुर में ही कुछ दिन पहले एक अलग सरकारी अस्पताल से भी ऐसा मामला सामने आया था। कांशीराम अस्पताल एवं ट्रॉमा सेंटर में एक डॉक्टर की गैरमौजूदगी में उसके ड्राइवर द्वारा मरीजों को देखने और दवाएं लिखने का वीडियो वायरल हुआ था। उस मामले में अस्पताल प्रशासन ने जांच शुरू की और आरोपी ड्राइवर के खिलाफ FIR दर्ज होने की रिपोर्ट सामने आई।
दोनों घटनाएं अलग-अलग हैं और इनके बीच कोई सीधा संबंध स्थापित नहीं हुआ है। लेकिन दोनों मामलों ने अस्पतालों में मरीजों को देखने वाले व्यक्ति की पहचान और जिम्मेदारी की निगरानी पर सवाल जरूर खड़े किए हैं।
अब किन सवालों के जवाब जरूरी?
एहसास अस्पताल के इस मामले में आगे कई सवालों के जवाब महत्वपूर्ण होंगे। पहला—क्या कृष्ण मोहन के पास वास्तव में MBBS की कोई डिग्री या मेडिकल रजिस्ट्रेशन है? दूसरा—अगर वह वार्डबॉय है तो पोस्टर में डॉक्टर और ICU स्पेशलिस्ट क्यों लिखा गया? तीसरा—पोस्टर किसने बनाया? और चौथा—क्या अस्पताल प्रबंधन को इस पोस्टर की जानकारी थी?
इन सवालों की आधिकारिक जांच या दस्तावेजी पुष्टि होने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि मामला केवल सोशल मीडिया पर हुई गलती तक सीमित था या इसके पीछे कोई बड़ा मामला है।


