हिंदू धर्म में पितृ पक्ष को पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और सम्मान प्रकट करने का विशेष समय माना जाता है। इस दौरान परिवार के लोग अपने दिवंगत पूर्वजों की स्मृति में श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान जैसे धार्मिक अनुष्ठान करते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार इन कर्मकांडों का उद्देश्य पितरों की आत्मा की शांति और उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना है। बिहार पर्यटन विभाग भी पितृ पक्ष के दौरान तर्पण में जल के साथ तिल अर्पित करने की परंपरा का उल्लेख करता है।
इसी धार्मिक परंपरा में काले तिल को विशेष स्थान दिया गया है। तर्पण के दौरान जल में काले तिल मिलाकर पूर्वजों के नाम से अर्पित करने और पितृ पक्ष में काले तिल का दान करने की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ऐसा करने से पितरों की तृप्ति और परिवार पर उनका आशीर्वाद बना रहता है।
2026 में कब से शुरू होगा पितृ पक्ष?
2026 में पितृ पक्ष की शुरुआत 26 सितंबर से होने की जानकारी सामने आई है। इस दौरान पूर्वजों की मृत्यु तिथि के अनुसार श्राद्ध करने की परंपरा है। पितृ पक्ष के अंतिम दिन सर्वपितृ अमावस्या का विशेष महत्व माना जाता है। उपलब्ध पंचांग संबंधी जानकारी के अनुसार 2026 में सर्वपितृ अमावस्या 10 अक्टूबर को होगी।
हालांकि अलग-अलग धार्मिक परंपराओं और पंचांगों में तिथि या मुहूर्त की गणना में अंतर हो सकता है। इसलिए किसी विशेष श्राद्ध कर्म के लिए स्थानीय पंचांग या विद्वान से मुहूर्त की पुष्टि करना उचित माना जाता है।
तर्पण में काले तिल का इस्तेमाल क्यों?
धार्मिक मान्यता के अनुसार तिल को पवित्र सामग्री माना जाता है। पितरों के लिए किए जाने वाले तर्पण में जल के साथ काले तिल अर्पित किए जाते हैं। माना जाता है कि तिल का प्रयोग पितरों को समर्पित कर्म को विशेष धार्मिक महत्व प्रदान करता है।
जागरण और अन्य धार्मिक स्रोतों में भी उल्लेख मिलता है कि काले तिल का उपयोग केवल तर्पण में ही नहीं, बल्कि पिंडदान, धार्मिक अर्पण और दान में भी किया जाता है।
कई धार्मिक मान्यताओं में काले तिल को शुद्धता और नकारात्मक प्रभावों से सुरक्षा से भी जोड़ा गया है। इसी वजह से पितृ पक्ष में तर्पण करते समय जल में काले तिल डालने की परंपरा कई परिवारों में आज भी निभाई जाती है।
काले तिल के दान की क्या मान्यता है?
पितृ पक्ष के दौरान जरूरतमंद व्यक्ति को काले तिल का दान करने की भी परंपरा बताई जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इससे पितरों की कृपा प्राप्त होती है और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है।
कुछ धार्मिक व्याख्याओं में काले तिल को पितृ दोष से जुड़ी बाधाओं को शांत करने वाली सामग्री के रूप में भी बताया गया है। हालांकि ये धार्मिक आस्थाएं और परंपरागत मान्यताएं हैं, इन्हें वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित तथ्य के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
कैसे किया जाता है काले तिल से तर्पण?
परंपरा के अनुसार तर्पण के लिए स्नान के बाद स्वच्छ स्थान पर बैठकर पूर्वजों का स्मरण किया जाता है। जल में काले तिल मिलाकर विधि के अनुसार पितरों को अर्पित किया जाता है। कुछ परंपराओं में तांबे के पात्र का इस्तेमाल भी बताया गया है।
जागरण की हालिया धार्मिक सामग्री में भी तर्पण के लिए जल में काले तिल, जौ और अन्य पूजन सामग्री मिलाकर पूर्वजों को अर्पित करने की परंपरा का उल्लेख किया गया है।
यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि श्राद्ध या तर्पण की विधि परिवार की परंपरा, क्षेत्र और धार्मिक मान्यता के अनुसार अलग हो सकती है। इसलिए किसी विशेष कर्मकांड को करने से पहले अपनी परंपरा के अनुसार विधि समझना बेहतर होता है।
पितृ पक्ष केवल कर्मकांड नहीं, स्मरण का अवसर भी
पितृ पक्ष को केवल दान या तर्पण तक सीमित नहीं माना जाता। इसका एक भावनात्मक पक्ष भी है। यह समय परिवार के उन लोगों को याद करने का अवसर माना जाता है, जो अब इस दुनिया में नहीं हैं।
पूर्वजों के प्रति सम्मान, उनके योगदान को याद करना और जरूरतमंदों की सहायता करना इस परंपरा के महत्वपूर्ण पहलू माने जाते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार श्राद्ध और तर्पण से पितरों को शांति मिलती है तथा उनका आशीर्वाद परिवार पर बना रहता है।


