नई दिल्ली: दिल्ली में CJP यानी कॉकरोच जनता पार्टी के नेताओं की हिरासत और रिहाई के बाद विवाद लगातार गहराता नजर आ रहा है। संगठन के नेता सौरव दास ने रिहा होने के बाद दिल्ली पुलिस की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने आशंका जताई कि हिरासत के दौरान लिए गए उनके मोबाइल फोन को हैक या क्लोन किया जा सकता है। उन्होंने यह भी चिंता जाहिर की कि फोन में दस्तावेज या कोई अन्य सामग्री डालकर उसे उनके खिलाफ इस्तेमाल किया जा सकता है। हालांकि, फिलहाल फोन हैक होने या उसमें किसी तरह के सबूत डाले जाने की पुष्टि करने वाला स्वतंत्र तकनीकी प्रमाण सार्वजनिक नहीं हुआ है।
हिरासत से बाहर आते ही मोबाइल फोन को लेकर चिंता
सौरव दास ने रिहाई के बाद पत्रकारों से बातचीत में दावा किया कि हिरासत के दौरान उनके मोबाइल फोन जब्त कर लिए गए थे, लेकिन उन्हें फोन जब्त किए जाने से संबंधित सीजर मेमो यानी जब्ती का आधिकारिक दस्तावेज नहीं दिया गया। उनके मुताबिक, ऐसी स्थिति में यह स्पष्ट नहीं हो पाता कि डिवाइस किस प्रक्रिया के तहत लिया गया और उसके साथ आगे क्या हुआ।
दास ने आशंका जताई कि जब तक फोन उनके पास नहीं थे, उस दौरान उनमें मौजूद डेटा तक पहुंच बनाई गई होगी या उनके साथ छेड़छाड़ की गई होगी। उन्होंने फोन हैक किए जाने और क्लोन बनाए जाने की संभावना भी व्यक्त की। उनका कहना था कि डिवाइस में कोई दस्तावेज या दूसरी सामग्री डालकर उसे बाद में उनके खिलाफ इस्तेमाल किए जाने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
यह ध्यान रखना जरूरी है कि ये सौरव दास की ओर से जताई गई आशंकाएं और लगाए गए आरोप हैं। सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी में ऐसी कोई फॉरेंसिक रिपोर्ट सामने नहीं आई है, जो साबित करती हो कि उनके मोबाइल फोन को वास्तव में हैक किया गया या उसमें कोई सामग्री डाली गई।
क्या है पूरा मामला, क्यों हिरासत में लिए गए CJP नेता?
यह पूरा घटनाक्रम दिल्ली में CJP के प्रस्तावित प्रदर्शन से जुड़ा है। संगठन के नेता मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करना चाहते थे। पार्टी ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR से जुड़े मुद्दों और कथित अनियमितताओं पर सवाल उठाए थे। संगठन की मांगों में मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग भी शामिल रही है।
10 अक्टूबर 2026 को दिल्ली पहुंचने के बाद CJP के प्रमुख अभिजीत दीपके, सौरव दास और आशुतोष रांका को पुलिस हिरासत में लिए जाने की खबर सामने आई थी। यह कार्रवाई ऐसे समय हुई, जब प्रस्तावित प्रदर्शन को लेकर राजधानी में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी की गई थी।
इसके बाद 11 अक्टूबर को तीनों नेताओं को कार्यकारी मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया गया और उन्हें शांति बनाए रखने की शर्त पर रिहा किए जाने की जानकारी सामने आई। रिहाई के बाद नेताओं ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर पुलिस की कार्रवाई, हिरासत की प्रक्रिया और अपने अधिकारों को लेकर सवाल उठाए।
कानूनी प्रक्रिया पर भी उठाए सवाल
सौरव दास ने आरोप लगाया कि हिरासत के दौरान उन्हें और अन्य नेताओं को यह स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई कि उन्हें किस आधार पर रोका गया है। उन्होंने यह भी दावा किया कि मोबाइल फोन जब्त किए जाने के बाद जरूरी दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए गए और कानूनी सहायता हासिल करने में भी परेशानी हुई।
इन आरोपों के बीच मोबाइल फोन की जब्ती और उसके बाद की प्रक्रिया महत्वपूर्ण सवाल बन गई है। किसी भी इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस की जांच में यह स्पष्ट होना जरूरी होता है कि उसे किस कानूनी आधार पर लिया गया, उसकी अभिरक्षा किसके पास रही और उसमें मौजूद डिजिटल डेटा के साथ क्या प्रक्रिया अपनाई गई।
हालांकि, इस मामले में पुलिस की ओर से उठाए गए सभी सवालों का विस्तृत जवाब और फोन की जांच से जुड़ी कोई स्वतंत्र तकनीकी रिपोर्ट सार्वजनिक जानकारी में उपलब्ध नहीं है। इसलिए फोन में छेड़छाड़ होने के दावे को फिलहाल आरोप और आशंका के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
हिरासत में कथित मारपीट का भी लगाया आरोप
प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान CJP नेताओं ने हिरासत में कथित दुर्व्यवहार और एक कार्यकर्ता के साथ मारपीट के आरोप भी लगाए। सौरव दास ने संगठन के मुंबई समन्वयक प्रणय के साथ कथित हिंसा का मुद्दा उठाया और मानवाधिकार संस्थाओं से सवाल किए।
इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है। संबंधित घटनाओं की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने के लिए शिकायत, मेडिकल दस्तावेज, पुलिस का पक्ष और किसी स्वतंत्र जांच के निष्कर्ष महत्वपूर्ण होंगे।
दिल्ली से देशभर तक आंदोलन जारी रखने का ऐलान
सौरव दास ने कहा कि नेताओं की रिहाई का अर्थ आंदोलन का समाप्त होना नहीं है। उन्होंने संकेत दिया कि CJP अपने मुद्दों को लेकर दिल्ली के बाहर भी प्रदर्शन जारी रखने की कोशिश करेगा। संगठन का कहना है कि उसका विरोध चुनावी प्रक्रिया और मतदाता सूची से जुड़े सवालों पर केंद्रित है।
दूसरी ओर, प्रदर्शन की अनुमति, कानून-व्यवस्था और पुलिस की कार्रवाई को लेकर विवाद अब राजनीतिक और नागरिक अधिकारों की बहस का हिस्सा बन गया है। ऐसे मामलों में शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार के साथ सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी भी महत्वपूर्ण होती है।
अब आगे क्या?
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल मोबाइल फोन की जब्ती और उसके बाद की प्रक्रिया को लेकर है। यदि फोन वास्तव में जब्त किए गए थे, तो संबंधित दस्तावेज, डिवाइस की अभिरक्षा का रिकॉर्ड और जरूरत पड़ने पर डिजिटल फॉरेंसिक जांच से स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
सौरव दास ने फोन हैक या क्लोन किए जाने की आशंका जताई है, लेकिन आशंका और साबित तथ्य में अंतर है। आगे पुलिस का आधिकारिक पक्ष, किसी औपचारिक शिकायत की स्थिति और तकनीकी जांच के नतीजे यह तय करने में अहम होंगे कि इन आरोपों में कितनी सच्चाई है।
फिलहाल CJP नेताओं की रिहाई के बाद भी विवाद जारी है। एक ओर संगठन पुलिस कार्रवाई को लेकर सवाल उठा रहा है, वहीं दूसरी ओर मोबाइल फोन से संबंधित आरोपों की पुष्टि के लिए ठोस साक्ष्यों और निष्पक्ष जांच की जरूरत बनी हुई है।


