महिला आरक्षण: और लोकसभा सीटों के परिसीमन को लेकर केंद्र सरकार एक बार फिर बड़ा राजनीतिक दांव खेलने की तैयारी में है। अप्रैल 2026 में संविधान संशोधन विधेयक को लोकसभा में जरूरी समर्थन नहीं मिल पाया था, लेकिन अब सरकार इन प्रस्तावों को दोबारा आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही है। इसी कड़ी में अक्टूबर के दूसरे पखवाड़े में संसद का विशेष सत्र बुलाए जाने की संभावना जताई जा रही है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इस बार सरकार संविधान संशोधन के लिए जरूरी बहुमत जुटा पाएगी? सरकार के करीबी सूत्रों के मुताबिक, सत्तापक्ष को अपने समर्थन का गणित बेहतर होने की उम्मीद है। इसी वजह से DMK और कुछ छोटे दलों से बातचीत की कोशिशें भी चर्चा में हैं। हालांकि, विशेष सत्र की तारीख और विधेयकों के अंतिम स्वरूप पर अभी औपचारिक घोषणा का इंतजार है।
अप्रैल में क्यों अटक गया था सरकार का विधेयक?
महिला आरक्षण को लागू करने की प्रक्रिया तेज करने के उद्देश्य से सरकार ने अप्रैल में तीन विधायी प्रस्ताव संसद के सामने रखे थे। इनमें संविधान संशोधन विधेयक, केंद्रशासित प्रदेशों से संबंधित संशोधन विधेयक और परिसीमन विधेयक शामिल थे।
संविधान संशोधन विधेयक का उद्देश्य लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण लागू करने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना था। इसके साथ परिसीमन की व्यवस्था में बदलाव और विधायी सदनों की सीटों की संख्या बढ़ाने का प्रस्ताव भी जुड़ा था।
लेकिन 17 अप्रैल 2026 को लोकसभा में संविधान संशोधन विधेयक जरूरी विशेष बहुमत हासिल नहीं कर सका। मतदान में 298 सदस्यों ने इसके पक्ष में और 230 ने विरोध में वोट दिया। संविधान संशोधन के लिए आवश्यक समर्थन नहीं मिलने के कारण इससे जुड़े दूसरे विधेयकों पर भी आगे कार्यवाही नहीं हो सकी।
यह सरकार के लिए बड़ा राजनीतिक झटका था। अब दोबारा कोशिश करने से पहले समर्थन जुटाना और विपक्ष की आपत्तियों का जवाब देना अहम हो गया है।
आखिर कितने वोटों की जरूरत है?
संविधान संशोधन विधेयक को पारित कराने के लिए सामान्य विधेयक की तुलना में अधिक कठिन बहुमत की आवश्यकता होती है। संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत दोनों सदनों में विशेष बहुमत जरूरी है। इसका अर्थ है कि सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत और मतदान करने वाले सदस्यों में कम-से-कम दो-तिहाई समर्थन हासिल करना होगा।
इसी वजह से लोकसभा में केवल साधारण बहुमत होना पर्याप्त नहीं है। सदन की वास्तविक सदस्य संख्या और मतदान के समय उपस्थित तथा वोट देने वाले सदस्यों के आधार पर आवश्यक आंकड़ा बदल सकता है। मौजूदा राजनीतिक गणित में लगभग 360 वोटों का आंकड़ा चर्चा में है, लेकिन सटीक जरूरत मतदान की स्थिति पर निर्भर करेगी।
अप्रैल के मतदान में पक्ष में पड़े 298 वोटों से स्पष्ट है कि सरकार को अतिरिक्त समर्थन जुटाना होगा। केवल राजनीतिक बयानबाजी या सत्र बुलाने से विधेयक पारित नहीं होगा; अंतिम फैसला सदन में वोटिंग से ही होगा।

DMK और छोटे दलों से बातचीत क्यों अहम?
हालिया रिपोर्टों के अनुसार, केंद्र सरकार DMK और कुछ छोटे दलों से समर्थन हासिल करने की संभावनाएं तलाश रही है। सरकार को उम्मीद है कि बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच कुछ दल विधेयकों पर उसका साथ दे सकते हैं।
लेकिन समर्थन का सवाल इतना आसान नहीं है। परिसीमन का मुद्दा राज्यों के बीच राजनीतिक प्रतिनिधित्व के संतुलन से जुड़ा है। दक्षिण भारत के कई दलों को आशंका रही है कि जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण होने पर अधिक आबादी वाले राज्यों का लोकसभा में प्रभाव बढ़ सकता है, जबकि जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों की तुलनात्मक हिस्सेदारी प्रभावित हो सकती है।
इसीलिए सरकार के लिए केवल दलों से बातचीत करना ही पर्याप्त नहीं होगा। उसे यह भी स्पष्ट करना होगा कि प्रस्तावित बदलाव से राज्यों के प्रतिनिधित्व पर क्या असर पड़ेगा और महिला आरक्षण को लागू करने के लिए परिसीमन को किस तरह जोड़ा जा रहा है।
महिला आरक्षण कानून को लेकर क्या है पूरा मामला?
महिला आरक्षण कानून, जिसे नारी शक्ति वंदन अधिनियम के नाम से जाना जाता है, 2023 में पारित हुआ था। इसका उद्देश्य लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित करना है। हालांकि, इसके लागू होने की प्रक्रिया जनगणना के बाद होने वाले परिसीमन से जुड़ी हुई है।
सरकार का प्रयास रहा है कि आरक्षण को लागू करने की समयसीमा आगे लाई जा सके। इसी संदर्भ में 2026 में परिसीमन और सीटों की संख्या बढ़ाने से जुड़े प्रस्ताव सामने आए। प्रस्तावित बदलावों में लोकसभा की सदस्य संख्या में बड़ी वृद्धि की संभावना भी शामिल रही है।
विपक्ष की आपत्तियां केवल महिला आरक्षण के उद्देश्य तक सीमित नहीं हैं। कई विपक्षी दलों ने आरक्षण को परिसीमन से जोड़ने, राज्यों के प्रतिनिधित्व और प्रस्तावित सीट-वितरण की प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। इसलिए आगामी चर्चा में यह मुद्दा भी अहम रहेगा कि महिला आरक्षण को लागू करने के लिए कौन-सा संवैधानिक और राजनीतिक रास्ता अपनाया जाए।
क्या इस बार पार हो जाएगा विधेयक?
सरकार को उम्मीद है कि समर्थन के नए समीकरण और दलों से बातचीत उसे इस बार बेहतर स्थिति में ला सकते हैं। लेकिन जब तक सभी दल अपना रुख स्पष्ट नहीं करते और सदन में मतदान नहीं होता, तब तक विधेयक के पारित होने का दावा करना जल्दबाजी होगी।
विशेष सत्र की तारीख तय करने में संसद के अन्य कार्यक्रमों को भी ध्यान में रखा जा सकता है। फिलहाल सरकार की रणनीति, DMK समेत संभावित सहयोगियों का रुख और विपक्ष की प्रतिक्रिया आने वाले दिनों में इस मुद्दे की दिशा तय करेंगे।


