नई दिल्ली। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने रविवार को दिल्ली में एक बुक लॉन्च कार्यक्रम में वैश्विक व्यापार, अमेरिकी टैरिफ और H-1B वीजा फीस पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि भारत को मौजूदा हालात से बाहर निकलने के लिए जो भी आवश्यक हो, वह कदम उठाना चाहिए, लेकिन “आंख मूंदकर आगे बढ़ना संभव नहीं है।”
अमेरिकी टैरिफ और वीजा फीस पर भागवत का रुख
भागवत ने कहा कि भारत को वैश्विक चुनौतियों का सामना अपनी दृष्टि और रणनीति से करना होगा। उन्होंने स्पष्ट किया—
“भारत और अन्य देशों के सामने आज जो समस्याएं हैं, वे उस खंडित दृष्टिकोण का नतीजा हैं, जो पिछले 2000 वर्षों से अपनाई गई व्यवस्था पर आधारित है। इसलिए हमें अपनी राह खुद तय करनी होगी।”
भागवत के अनुसार, मौजूदा हालात से निकलने का रास्ता भले ही मिल जाए, लेकिन जब तक दुनिया की सोच ‘मैं और बाकी दुनिया’ या ‘हम और वे’ जैसी रहेगी, तब तक ऐसे संकट दोबारा आते रहेंगे।
अमेरिका पर निशाना: “सुरक्षा केवल अपने हितों की”
RSS प्रमुख ने कहा कि कुछ साल पहले उनकी मुलाकात अमेरिका के एक शीर्ष व्यक्ति से हुई थी। उस बातचीत में सुरक्षा, आतंकवाद-निरोध और अर्थव्यवस्था पर भारत-अमेरिका सहयोग की बात हुई, लेकिन हर बार उन्होंने यही कहा कि—
“यह सहयोग तभी संभव है जब अमेरिकी हित सुरक्षित रहें।”
भागवत ने कहा कि यही अंतरराष्ट्रीय राजनीति की सच्चाई है। हर कोई अपने-अपने हित देखता है। जो ऊपर है, वह नीचे वालों पर हावी हो जाता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि फूड चेन में सबसे ऊपर रहना सबको खाने जैसा है और सबसे नीचे रहना अपराध जैसा माना जाता है।
पर्यावरणीय मुद्दों पर भारत की प्रतिबद्धता
भागवत ने कहा कि दुनिया में केवल भारत ही ऐसा देश है जिसने पर्यावरणीय मुद्दों पर अपनी सभी प्रतिबद्धताओं को पूरा किया है। जबकि अन्य देशों में इस मामले में कोई प्रामाणिकता नहीं दिखती। उन्होंने कहा कि अगर भारत को विश्वगुरु और विश्वामित्र बनना है, तो उसे अपनी दृष्टि और अपने मूल्यों पर आधारित रास्ता खुद तय करना होगा।
सनातन दृष्टिकोण ही समाधान
उन्होंने कहा—
“अगर हमें इन समस्याओं का समाधान चाहिए, तो हमें अपने दृष्टिकोण से सोचना होगा। सौभाग्य से भारत का दृष्टिकोण पारंपरिक और सनातन है, जो हजारों वर्षों के अनुभवों से विकसित हुआ है। यही हमारी ताकत है।”
भागवत ने यह भी जोर दिया कि विकास और प्रगति के पश्चिमी मॉडल से हटकर भारत को अपने सनातन दृष्टिकोण पर आधारित विकास पथ तैयार करना चाहिए, तभी भविष्य की चुनौतियों से बचा जा सकेगा।


