in ,

बिहार की खामोश बर्बादी: जब डालमिया नगर से लेकर फतुहा तक उद्योग ताश के पत्तों की तरह ढहने लगे

नेहरू की नीति से लेकर लालू के जंगलराज तक, बिहार का औद्योगिक पतन कैसे बना एक राजनीतिक मौन का विषय

बिहार | 2025 के चुनावी शोरगुल के बीच बिहार फिर मुद्दों के घेरे में है, लेकिन जो मुद्दा हर बार गायब रहता है वह है — बिहार की औद्योगिक विरासत का विनाश।

राजनीतिक बहसें जाति समीकरण, सत्ता बदलने और घोषणाओं के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गई हैं, लेकिन वो डालमिया नगर, वो बनमनखी की चीनी मिलें, और फतुहा के स्कूटर कारखाने — अब केवल धूल और दीवारों में तब्दील हो चुके हैं।


1951: जब बिहार उद्योगों का गढ़ था

  • भारत की स्वतंत्रता के महज तीन साल बाद यानी 1951 में बिहार देश के कुल उद्योगों का 6.57% हिस्सा अकेले रखता था।

  • देश की 56 में से 33 चीनी मिलें बिहार में थीं।

  • केवल चीनी उद्योग में ही 30% राष्ट्रीय रोजगार बिहार से आता था।

बनमनखी की एशिया की सबसे बड़ी चीनी मिल में 10 हजार लोग सीधे और 10 लाख लोग अप्रत्यक्ष रूप से कार्यरत थे।


फतुहा से विजय सुपर तक

विजय सुपर स्कूटर बिहार की पहचान था, जिसे फतुहा में बनाया जाता था।
आज जब फतुहा का नाम लिया जाता है, तो शायद ही कोई युवा उसकी औद्योगिक पहचान जानता हो।


डालमिया नगर: बिहार का औद्योगिक स्वर्ण युग

डेहरी ऑन सोन में डालमिया समूह ने एक ऐसा औद्योगिक नगर बसाया था जो बिजली, पानी, आवास, शिक्षा और चिकित्सा जैसी सभी सुविधाओं के लिए मिसाल था।

  • कनाडा तक की पेपर इंडस्ट्री डालमिया नगर पर निर्भर थी।

  • यह क्षेत्र कभी टाटा-बिड़ला के समकक्ष माना जाता था।


नेहरू की नीतियों ने की शुरुआत

पंडित जवाहरलाल नेहरू के शासनकाल में एक तथाकथित “मॉल भाड़ा नीति” लाई गई, जिसमें खनिजों के ट्रांसपोर्ट पर सब्सिडी और तैयार माल पर भारी टैक्स लगाया गया।
नतीजा:

  • कच्चा माल बिहार से बाहर ले जाने वालों की चांदी हो गई

  • वहीं, बिहार में उत्पादन करने वाले उद्योग दम तोड़ने लगे


फिरोज गांधी और रिपोर्ट की राजनीति

फिरोज गांधी के जरिए डालमिया जैसे समूहों पर दबाव डाला गया कि वे अपने संस्थानों में नेहरू-इंदिरा का हिस्सा दें।
इनकार करने पर रिपोर्ट्स प्रकाशित कर उन्हें भ्रष्ट और अव्यवस्थित बताकर बर्बादी की ओर धकेला गया, ठीक वैसे ही जैसे आज हिंडनबर्ग रिपोर्ट्स के बहाने होते हैं।


लालू राज: आखिरी कील

जब लालू यादव सत्ता में आए, तब तक अधिकांश उद्योग या तो बंद हो चुके थे या खंडहर बन चुके थे।

  • लालू शासन ने इन बचे-खुचे उद्योगों को अपहरण, वसूली, लूट और अपराध के ऐसे जाल में फंसाया कि बिहार पूरी तरह उद्योग विहीन प्रदेश बन गया।

  • यही कारण है कि आज बिहार से पलायन सबसे बड़ी सच्चाई है।


चुनावी चुप्पी क्यों?

आज बिहार चुनाव में हर कोई विकास की बात करता है लेकिन न कोई डालमियानगर का नाम लेता है, न ही फतुहा या बनमनखी का।
ना किसी चैनल ने इन खंडहरों की तस्वीर दिखाई, और ना किसी यूट्यूबर ने इन फैक्ट्रियों पर रिपोर्ट बनाई।


निष्कर्ष

बिहार का सवाल केवल विकास का नहीं, बल्कि न्याय का है।
एक प्रदेश जो भारत की रीढ़ हुआ करता था, आज आर्थिक पराश्रय की तलाश में दर-बदर है।
बिहार के राजनीतिक दलों और मतदाताओं दोनों को यह याद रखना होगा कि अगर मुद्दों का दायरा जाति और वादों तक ही सीमित रहा, तो “अखंड भारत” की यह औद्योगिक आत्मा कभी पुनर्जीवित नहीं हो सकेगी।

News Desk

Written by News Desk

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

स्वामी प्रसाद मौर्य के घर के बाहर गंगाजल लेकर पहुंचे कार्यकर्ता: लखनऊ में हंगामा, पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया

गोरखपुर-बस्ती मंडल की समीक्षा बैठक में सीएम योगी का निर्देश — सीएम ग्रिड योजना और आपदा निधि से भी मिलेगा सहयोग