नोएडा। ग्रेटर नोएडा के 10 साल पुराने अखलाक लिंचिंग केस में अदालत ने यूपी सरकार को बड़ा झटका दिया है। नोएडा के सूरजपुर कोर्ट ने मंगलवार को आरोपियों के खिलाफ दर्ज मुकदमा वापस लेने की राज्य सरकार की याचिका खारिज कर दी।
कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि—
“केस वापसी के लिए लगाई गई अर्जी में कोई ठोस कानूनी आधार नहीं है। आरोपियों के खिलाफ चल रही न्यायिक प्रक्रिया जारी रहेगी।”
अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि इस मामले में रोजाना सुनवाई की जाएगी। अगली सुनवाई की तारीख 6 जनवरी 2026 तय की गई है।
2015 में गोमांस के शक में पीट-पीटकर हत्या
यह मामला 28 सितंबर 2015 का है, जब ग्रेटर नोएडा के दादरी क्षेत्र में गोमांस रखने के शक में भीड़ ने मोहम्मद अखलाक को उसके घर से खींचकर लाठी-डंडों से पीट-पीटकर मार डाला था। इस घटना ने देशभर में आक्रोश पैदा कर दिया था और मॉब लिंचिंग पर राष्ट्रीय बहस छिड़ गई थी।
यूपी सरकार ने क्यों मांगी थी केस वापसी
यूपी सरकार के वकील ने अक्टूबर 2025 में कोर्ट में याचिका दाखिल कर दलील दी थी कि—
- मुकदमा वापस लेने से सामाजिक सौहार्द बहाल होगा
- गवाहों के बयानों में आरोपियों की संख्या बदलती रही
- घटना में धारदार हथियार या आग्नेयास्त्र का प्रयोग नहीं हुआ
- दोनों पक्षों के बीच पूर्व रंजिश के साक्ष्य नहीं मिले
सरकार ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 321 के तहत मुकदमा वापसी की अनुमति मांगी थी।
कोर्ट ने सरकार की दलीलों को किया खारिज
अदालत ने सरकार की सभी दलीलों को अस्वीकार करते हुए कहा कि—
- केवल सामाजिक सौहार्द का तर्क मुकदमा वापसी का आधार नहीं हो सकता
- गंभीर आपराधिक मामले में न्यायिक प्रक्रिया बाधित नहीं की जा सकती
कोर्ट ने अभियोजन पक्ष को निर्देश दिया कि वह गवाहों के बयान दर्ज करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाए।
गवाहों को सुरक्षा देने का आदेश
अदालत ने पुलिस कमिश्नर और डीसीपी ग्रेटर नोएडा को निर्देश दिए कि—
- यदि किसी गवाह को सुरक्षा की आवश्यकता हो, तो तत्काल सुरक्षा उपलब्ध कराई जाए
अखलाक के परिवार के वकील यूसुफ सैफी और अंदलीब नकवी ने बताया कि कोर्ट ने यूपी सरकार की याचिका को पूरी तरह आधारहीन मानते हुए खारिज कर दिया है।
विपक्ष और सामाजिक संगठनों की प्रतिक्रिया
सुनवाई के दौरान सीपीआईएम नेता वृंदा करात भी कोर्ट में मौजूद रहीं। उन्होंने कहा—
“सरकार की अर्जी पूरी तरह आधारहीन थी। कोर्ट ने इसे खारिज कर यह साबित कर दिया कि कानून के सामने सभी बराबर हैं। हम आगे भी पीड़ित परिवार के साथ खड़े रहेंगे।”
सरकार की ओर से जारी लेटर की पृष्ठभूमि
यूपी शासन के न्याय अनुभाग-5 (फौजदारी), लखनऊ ने 26 अगस्त 2025 को शासनादेश जारी कर मुकदमा वापसी का निर्णय लिया था। इसके बाद 12 सितंबर 2025 को गौतमबुद्धनगर के संयुक्त निदेशक अभियोजन ने जिला शासकीय वकील को पत्र लिखकर कार्रवाई के निर्देश दिए थे। पत्र में उल्लेख था कि राज्यपाल की अनुमति प्राप्त है।
अखलाक लिंचिंग केस में कोर्ट का यह फैसला कानून के राज और पीड़ितों के अधिकारों की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि भीड़ हिंसा जैसे गंभीर अपराधों में राजनीतिक या प्रशासनिक हस्तक्षेप के जरिए न्याय प्रक्रिया नहीं रोकी जा सकती। अब इस केस में रोजाना सुनवाई से पीड़ित परिवार को न्याय की उम्मीद फिर से मजबूत हुई है।


