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राजस्थान में चौंकाने वाला मामला: आठवीं पास शख्स पर फर्जी डॉक्टर बनकर 100 बेड का अस्पताल चलाने का आरोप

जयपुर/जालोर: राजस्थान के जालोर जिले से सामने आए कथित फर्जी डॉक्टर के मामले ने चिकित्सा व्यवस्था और मेडिकल डिग्रियों के सत्यापन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जांच एजेंसी के मुताबिक, जिस व्यक्ति ने कभी निजी क्लिनिक में मरीजों की पर्चियां बनाने का काम किया था, वह आगे चलकर एक अस्पताल का संचालक बन गया। आरोप है कि उसने फर्जी शैक्षणिक दस्तावेजों के सहारे डॉक्टर के रूप में पंजीकरण हासिल किया और मरीजों का इलाज करने के साथ सर्जरी भी करने लगा। इस मामले में राजस्थान पुलिस के स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप (SOG) ने दो आरोपियों को गिरफ्तार किया है।

मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि अस्पताल संचालक नानजीराम चौधरी की पढ़ाई कथित तौर पर आठवीं कक्षा तक ही हुई थी। इसके बावजूद जांच में उसके पास दसवीं-बारहवीं की अंकतालिकाओं, MBBS डिग्री और स्त्री रोग से जुड़े डिप्लोमा के दस्तावेज होने का मामला सामने आया। पुलिस अब इन दस्तावेजों की वास्तविकता, मेडिकल रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया और इस कथित फर्जीवाड़े में दूसरे लोगों की भूमिका की जांच कर रही है।

पर्चियां बनाने से अस्पताल संचालक बनने तक का सफर

SOG की जांच के अनुसार, नानजीराम चौधरी ने करीब वर्ष 2010 में एक निजी क्लिनिक के ओपीडी काउंटर पर काम करना शुरू किया था। वहां उसका काम मरीजों की एंट्री और पर्चियां तैयार करना था। बाद में वह जालोर जिले के रानीवाड़ा स्थित एक अस्पताल से जुड़ा। जांच में सामने आया कि उसने कुछ समय बाद अस्पताल खरीद लिया और वर्ष 2016 में उसका नाम बदलकर भास्कर अस्पताल रख दिया।

धीरे-धीरे अस्पताल में चिकित्सा सेवाओं का दायरा बढ़ा। बताया गया है कि वहां पहले सामान्य चिकित्सा से जुड़े डॉक्टर काम करते थे और बाद में स्त्री रोग विशेषज्ञ को भी नियुक्त किया गया। इसी दौरान चौधरी डॉक्टरों के पंजीकरण से जुड़े कागजी काम संभालता था और राजस्थान मेडिकल काउंसिल के कार्यालय भी जाता था।

जांच एजेंसी को संदेह है कि इसी प्रक्रिया का फायदा उठाकर उसने कथित तौर पर अपने लिए भी मेडिकल रजिस्ट्रेशन हासिल किया। हालांकि, रजिस्ट्रेशन की पूरी प्रक्रिया में किसकी क्या भूमिका रही, इसका पता जांच पूरी होने के बाद ही चलेगा।

MBBS और स्त्री रोग के डिप्लोमा पर उठे सवाल

SOG के मुताबिक, चौधरी ने राजस्थान मेडिकल काउंसिल में पंजीकरण के लिए कई शैक्षणिक दस्तावेज पेश किए थे। इनमें दसवीं और बारहवीं की मार्कशीट, MBBS डिग्री और गायनेकोलॉजी एंड ऑब्स्टेट्रिक्स से जुड़े डिप्लोमा के दस्तावेज शामिल बताए गए हैं।

जांच के दौरान संबंधित संस्थान से दस्तावेजों का सत्यापन कराया गया। अधिकारियों के अनुसार, मुंबई स्थित कॉलेज ऑफ फिजिशियंस एंड सर्जन्स से संबंधित डिप्लोमा प्रमाणपत्र, अलॉटमेंट लेटर और पासिंग सर्टिफिकेट को फर्जी बताया गया। इसके बाद मामले की जांच का दायरा बढ़ाया गया।

आरोप है कि चौधरी अस्पताल का संचालन करने के साथ मरीजों का इलाज और ऑपरेशन भी करता था। किसी व्यक्ति की वास्तविक चिकित्सा योग्यता की पुष्टि किए बिना उसे डॉक्टर के रूप में काम करने देना मरीजों की सुरक्षा के लिए गंभीर चिंता का विषय है। हालांकि, अब तक उपलब्ध जानकारी में उसके द्वारा किए गए ऑपरेशनों की कुल संख्या या किसी मरीज को हुए नुकसान का आधिकारिक विवरण सामने नहीं आया है।

दूसरा आरोपी भी फर्जी डिग्री के आरोप में गिरफ्तार

इस मामले में गिरफ्तार दूसरा आरोपी पंकज यादव है, जो सीकर जिले का निवासी बताया गया है। SOG के अनुसार, उसने वर्ष 2013 से 2018 के बीच कजाकिस्तान में MBBS की पढ़ाई की थी। भारत में मेडिकल प्रैक्टिस के लिए आवश्यक फॉरेन मेडिकल ग्रेजुएट एग्जामिनेशन (FMGE) में वह कथित तौर पर छह बार सफल नहीं हो सका।

जांच एजेंसी का आरोप है कि इसके बाद उसने बिहार के श्रीकृष्ण मेडिकल कॉलेज के नाम से फर्जी MBBS डिग्री और अंकतालिकाएं तैयार कराईं। बिहार मेडिकल काउंसिल के पंजीकरण से जुड़ा कथित फर्जी प्रमाणपत्र इस्तेमाल किए जाने की बात भी जांच में सामने आई।

जब संबंधित शैक्षणिक संस्थानों से दस्तावेजों का सत्यापन कराया गया, तो अधिकारियों को कथित अनियमितताएं मिलीं। SOG ने पंकज यादव को हरियाणा के कैथल से गिरफ्तार किया। अब उससे पूछताछ कर यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि दस्तावेज कहां तैयार किए गए और उन्हें हासिल करने में किसने मदद की।

मेडिकल काउंसिल की शिकायत से खुला मामला

इस प्रकरण की जांच राजस्थान मेडिकल काउंसिल की शिकायत के बाद शुरू हुई थी। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, 6 अक्टूबर 2024 को जयपुर के अशोक नगर थाने में कथित जाली दस्तावेजों के आधार पर मेडिकल रजिस्ट्रेशन हासिल करने के मामले में शिकायत दर्ज कराई गई थी। शुरुआत में कई लोगों के नाम सामने आए थे। जांच आगे बढ़ने पर नानजीराम चौधरी के खिलाफ भी कार्रवाई की गई।

SOG अब यह पता लगाने में जुटी है कि कथित फर्जी डिग्रियां किसने तैयार कीं, मेडिकल काउंसिल में पंजीकरण किस तरह हुआ और क्या इस प्रक्रिया में किसी अन्य व्यक्ति की मिलीभगत थी। मामले में आगे और खुलासे होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन इसकी पुष्टि जांच के नतीजों के आधार पर ही होगी।

मरीजों की सुरक्षा पर बड़ा सवाल

यह मामला केवल कथित फर्जी दस्तावेजों तक सीमित नहीं है। यदि कोई व्यक्ति आवश्यक मेडिकल योग्यता और वैध पंजीकरण के बिना मरीजों का इलाज करता है, तो इससे मरीजों की जान और स्वास्थ्य पर गंभीर जोखिम पैदा हो सकता है। अस्पतालों में डॉक्टरों की डिग्री, पंजीकरण और विशेषज्ञता का सत्यापन इसलिए बेहद जरूरी है।

अब निगाहें SOG की आगे की जांच पर हैं। जांच से यह स्पष्ट हो सकेगा कि आरोपियों ने कथित तौर पर किस तरह दस्तावेज हासिल किए, उनके आधार पर रजिस्ट्रेशन कैसे हुआ और इस पूरे मामले में अन्य लोगों की क्या भूमिका रही।

News Desk

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