🌸 राष्ट्रगीत के 150 वर्ष: ‘वंदे मातरम्’— राष्ट्रभूमि की चेतना का स्वर
लेखक: आचार्य संजय तिवारी
वंदे मातरम् — दो शब्दों में समाया सम्पूर्ण भारतीय दर्शन, भक्ति और मातृभूमि के प्रति अद्भुत समर्पण।
‘वंदे’ अर्थात वंदना करना, और ‘मातरम्’ अर्थात ‘माँ’। यह माँ केवल एक जननी नहीं, बल्कि वह धरती है जिसने हमें, पशु-पक्षियों, वृक्षों, नदियों, पर्वतों और समस्त जगत को जन्म दिया। यही कारण है कि भारत ने सदा से उसे भू देवी, मातृशक्ति और जननी जन्मभूमि के रूप में पूजा है।
🌿 मातृ तत्व की स्तुति — श्रुति से बंकिम तक
भारतीय वेदों में पृथ्वी को “माता भूमि: पुत्रो अहं पृथिव्या:” कहा गया है — “हे पृथ्वी माता, मैं तेरा पुत्र हूँ।”
इस वैदिक भाव को ही आधुनिक युग में बंकिम चंद्र चटर्जी ने शब्द दिए — “वंदे मातरम्।”
1876 में बंगाल के कांतलपाड़ा गाँव में इस गीत की रचना हुई और 1882 में यह उनके प्रसिद्ध उपन्यास आनंदमठ में प्रकाशित हुआ।
यह गीत केवल मातृभूमि की वंदना नहीं बल्कि प्रकृति, शक्ति, ज्ञान और धर्म का गीत है।
‘सुजलां सुफलाम् मलयजशीतलाम्’ जैसे शब्द जीवनदायिनी प्रकृति की वंदना करते हैं, जबकि
‘बहुबलधारिणीं नमामि तारिणीं’ मातृशक्ति की सर्वोपरिता को दर्शाते हैं।
🎵 वंदे मातरम् की रचना और स्वर यात्रा
-
रचनाकार: बंकिम चंद्र चटर्जी
-
स्वर: रवीन्द्रनाथ टैगोर (1896, कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन)
-
संगीतकार: यदुनाथ भट्टाचार्य
-
भाषा: संस्कृत-बांग्ला मिश्रित
-
गायन अवधि: 65 सेकंड
-
बीबीसी सर्वे (2003): विश्व के शीर्ष 10 गीतों में दूसरा स्थान
⚙️ राष्ट्रगीत बनने की यात्रा
‘वंदे मातरम्’ पहली बार 1896 में कांग्रेस अधिवेशन में गाया गया।
स्वतंत्रता आंदोलन में यह गीत राष्ट्रवादी नारा बन गया —
“वंदे मातरम्” के जयघोष से भारत के गाँव, कस्बे और जेल की दीवारें गूंज उठीं।
15 अगस्त 1947 की सुबह 6:30 बजे पं. ओंकारनाथ ठाकुर ने इसे राग देश में गाया — और स्वतंत्र भारत की पहली सुबह में इसकी गूंज ने देश को भाव-विभोर कर दिया।
1950 में डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने संविधान सभा में इसकी घोषणा करते हुए कहा —
“वंदे मातरम् को ‘जन गण मन’ के समान दर्जा दिया जाएगा।”
🕊️ स्वतंत्रता संग्राम में राष्ट्रगीत की भूमिका
-
1905 में बंगाल विभाजन के विरोध में यह गीत स्वदेशी आंदोलन का प्रतीक बना।
-
लाला लाजपत राय के जर्नल का नाम भी “वंदे मातरम्” था।
-
मातंगिनी हाजरा ने फांसी से पहले “वंदे मातरम्” का उद्घोष किया।
-
भीकाजी कामा ने जर्मनी में तिरंगा फहराते हुए बीच में “वंदे मातरम्” अंकित कराया।
⚡ विवादों का सिलसिला
1930 के दशक में कुछ मुस्लिम नेताओं ने गीत के “रिपुदलवारिणीं” (दुश्मनों का संहार करने वाली) शब्द को गलत समझा।
1937 में नेहरू, मौलाना आजाद, सुभाष बोस और टैगोर की समिति ने निर्णय लिया —
केवल पहले दो पद राष्ट्रगीत माने जाएं, शेष धार्मिक अंश वैकल्पिक रहें।
1950 में संविधान सभा ने इन्हीं दो पदों को राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया।
🧭 बिहार और बंगाल से जुड़ाव
वंदे मातरम् की रचना बंगाल में हुई, पर इसका पोषण बिहार ने किया।
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने ही संविधान सभा में इसे राष्ट्रगीत का दर्जा दिलाया।
लोकनायक जयप्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रांति के समय भी
‘वंदे मातरम्’ क्रांतिकारियों की आवाज़ बना।
दुर्भाग्यवश, आज उसी बिहार में इस गीत को लेकर विरोध देखने को मिलता है —
राजनीतिक और धार्मिक मतभेदों के बीच वह गीत, जिसने भारत को एकजुट किया, विवाद का विषय बन गया।
⚖️ सुप्रीम कोर्ट का रुख
सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कहा है —
“राष्ट्रगीत गाना किसी पर बाध्यकारी नहीं,
किंतु उसका सम्मान करना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है।”
🪷 आधुनिक सन्दर्भ में वैज्ञानिक और सांस्कृतिक महत्व
‘वंदे मातरम्’ केवल एक गीत नहीं, बल्कि कॉस्मिक एनर्जी का कंपन है।
इसमें जल, वायु, अन्न, ज्ञान, धर्म और भक्ति का वैज्ञानिक समन्वय है।
भारत की आत्मा को ब्रह्मांड की चेतना से जोड़ने वाला यह शब्द-शक्ति का मंत्र है।
🏁 निष्कर्ष:
150 वर्ष बाद भी “वंदे मातरम्” भारत की आत्मा का स्वर है।
यह गीत न केवल मातृभूमि की वंदना है, बल्कि भारतीय संस्कृति, एकता, और राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक है।
आज जब देश विभाजनकारी सोच और तुष्टिकरण की राजनीति से जूझ रहा है,
तो “वंदे मातरम्” फिर से याद दिलाता है —
“हम सबकी माँ एक है, हमारी मातृभूमि एक है, और हमारी वंदना भी एक होनी चाहिए।”
वंदे मातरम्।


