गुवाहाटी: असम में पिछले 10 दिनों से मटक समेत छह आदिवासी समुदाय सड़कों पर उतर आए हैं। डिब्रूगढ़ और तिनसुकिया में दो बड़ी रैलियां निकाली गईं, जिनमें 30 से 50 हजार लोगों की भीड़ जुटी। हाथों में मशाल लिए ये लोग अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा और पूर्ण स्वायत्तता की मांग कर रहे हैं।
असम का यह आंदोलन उस समय शुरू हुआ है, जब राज्य गायक जुबीन गर्ग की मौत के शोक में डूबा है। बावजूद इसके, युवाओं की अगुवाई में यह विरोध लगातार तेज होता जा रहा है।
आंदोलन की कमान युवाओं के हाथ
रैली में शामिल भीड़ का बड़ा हिस्सा 30 साल से कम उम्र का है। ऑल असम मटक स्टूडेंट यूनियन के अध्यक्ष संजय हजारिका ने कहा—
“हम मूल रूप से जनजाति हैं, लेकिन आज तक हमें दर्जा नहीं मिला। सरकार ने हर बार हमें धोखा दिया है। अब हम तब तक आंदोलन करेंगे, जब तक समाधान नहीं मिलता। नई दिल्ली तक जाएंगे और विरोध दर्ज कराएंगे।”
पहली बार इतने बड़े स्तर पर विरोध
वरिष्ठ पत्रकार राजीव दत्त बताते हैं कि पहली बार मटक समुदाय ने इतने बड़े पैमाने पर विरोध किया है।
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19 सितंबर को तिनसुकिया की रैली में 50 हजार लोग शामिल हुए।
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26 सितंबर को डिब्रूगढ़ में 30 हजार से ज्यादा लोग उतरे।
सरकार ने समुदाय को बातचीत के लिए बुलाया, लेकिन नेताओं ने साफ इनकार कर दिया।
मोरान समुदाय का भी आक्रोश
इससे पहले अगस्त में मोरान समुदाय ने भी डिब्रूगढ़ में बड़ा आंदोलन किया था। ऑल मोरान स्टूडेंट यूनियन ने नारा दिया— “नो एसटी, नो रेस्ट।”
यूनियन महासचिव जोयकांता मोरान के अनुसार, “2014 से कई दौर की बैठकें हुईं, लेकिन कोई समाधान नहीं निकला। इस बार 25 नवंबर तक की डेडलाइन है, नहीं तो हम आर्थिक नाकेबंदी करेंगे।”
असम सरकार के लिए खतरे की घंटी
मटक के साथ चाय जनजाति, ताई अहोम, मोरान, चुटिया और कोच राजबोंगशी भी आंदोलन में हैं। 2011 की जनगणना के मुताबिक, असम की 3.12 करोड़ आबादी में 38 लाख (12.4%) इन समुदायों के हैं।
यदि इन्हें ST दर्जा मिल जाता है तो राज्य में आदिवासियों की संख्या 40% तक पहुंच जाएगी। इससे गैर-आदिवासी समुदायों में आशंका है कि असम भी नगालैंड जैसे राज्यों की तरह “पूर्ण आदिवासी प्रदेश” बन जाएगा और उसे छठी अनुसूची में शामिल करना केंद्र की मजबूरी हो जाएगी।
चुनावी साल में बढ़ा तनाव
असम विधानसभा चुनाव नजदीक हैं। मुख्यमंत्री हिमंता बिस्व सरमा बार-बार बातचीत की अपील कर रहे हैं, लेकिन समुदाय के युवा सड़कों पर डटे हैं। उनका साफ कहना है कि “वादा नहीं, अब लिखित गारंटी चाहिए।”


