नई दिल्ली। हिंदी सिनेमा में अपनी अलग पहचान बनाने वाले अभिनेता अखिलेंद्र मिश्रा ने मौजूदा फिल्म इंडस्ट्री को लेकर अपनी नाराजगी जाहिर की है। ‘क्रूर सिंह’, ‘मिर्ची सेठ’ और ‘डीएसपी भुरेलाल’ जैसे यादगार किरदारों से दर्शकों के बीच पहचान बनाने वाले अभिनेता का कहना है कि आज फिल्मों और टेलीविजन में पहले की तरह मजबूत और अलग पहचान वाले किरदार कम देखने को मिल रहे हैं।
एक हालिया बातचीत में अखिलेंद्र मिश्रा ने कहा कि किसी कलाकार के लिए स्क्रीन टाइम से ज्यादा महत्वपूर्ण उसका किरदार होता है। उनके मुताबिक, पहले सपोर्टिंग रोल भी इतने प्रभावशाली तरीके से लिखे जाते थे कि दर्शक उन्हें वर्षों तक याद रखते थे। अब कई फिल्मों में किरदारों की अपनी अलग पहचान नजर नहीं आती।
‘हर कोई एक तरह से एक्टिंग करता है…’
अखिलेंद्र मिश्रा ने पीटीआई से बातचीत में मौजूदा फिल्मों में अभिनय के तरीके पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि आज कई कलाकार एक ही तरह से अभिनय करते और एक ही तरह के लहजे में संवाद बोलते नजर आते हैं। इससे किरदारों की विशिष्टता कम हो जाती है।
अभिनेता का मानना है कि जब किसी फिल्म का किरदार ठीक से विकसित नहीं होता तो दर्शक उसके साथ भावनात्मक रूप से जुड़ नहीं पाते। इसका सीधा असर फिल्म की कहानी और दर्शकों के अनुभव पर पड़ता है।
उन्होंने अलग-अलग रंगों की तुलना इंद्रधनुष से करते हुए समझाया कि कहानी, अभिनय, संगीत, भावनाओं और प्रस्तुति में विविधता जरूरी है। उनके मुताबिक, सिनेमा में अलग-अलग रंग होंगे तभी दर्शकों को कुछ नया और यादगार देखने को मिलेगा।

‘गब्बर सिंह और मोगैम्बो जैसे किरदार कहां हैं?’
अखिलेंद्र मिश्रा ने पुराने दौर के उन किरदारों का भी जिक्र किया, जो आज भी दर्शकों की यादों में मौजूद हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि अब ‘गब्बर सिंह’ और ‘मोगैम्बो’ जैसे किरदार क्यों नहीं दिखाई देते।
उनका कहना है कि पहले फिल्मों में पुलिस, विलेन या सपोर्टिंग कैरेक्टर भी अपनी अलग पहचान रखते थे। ऐसे किरदारों को सिर्फ कहानी का हिस्सा नहीं माना जाता था, बल्कि उन्हें एक खास व्यक्तित्व और संवाद शैली दी जाती थी।
अभिनेता ने अपने करियर के उदाहरण देते हुए बताया कि उन्हें थिएटर में किए गए काम के आधार पर फिल्मों में मौके मिले। इसी वजह से वह मानते हैं कि कलाकार और किरदार के बीच सही तालमेल किसी फिल्म को यादगार बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
थिएटर से फिल्मों तक पहुंचने का बताया अनुभव
अखिलेंद्र मिश्रा ने अपने करियर से जुड़ा अनुभव साझा करते हुए बताया कि उन्हें ‘सरफरोश’ में मिर्ची सेठ के किरदार के लिए निर्देशक जॉन मैथ्यू मथन ने उनके थिएटर काम को देखने के बाद चुना था।
इसी तरह ‘चंद्रकांता’ में क्रूर सिंह का किरदार भी उनकी पहचान का अहम हिस्सा बना। उनके अभिनय की खास शैली और संवाद अदायगी ने इस किरदार को दर्शकों के बीच लोकप्रिय बना दिया।
‘गंगाजल’ में डीएसपी भुरेलाल का किरदार भी उनके चर्चित कामों में शामिल है। इन भूमिकाओं ने यह साबित किया कि कहानी में छोटा या बड़ा रोल होने से ज्यादा महत्वपूर्ण किरदार का प्रभाव होता है।
इंडस्ट्री बदली, काम करने का तरीका हुआ व्यवस्थित
हालांकि अखिलेंद्र मिश्रा ने हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में हुए बदलावों को पूरी तरह नकारात्मक नहीं बताया। उन्होंने माना कि पिछले कुछ वर्षों में फिल्मों और वेब सीरीज के निर्माण का तरीका काफी व्यवस्थित हुआ है।
उनके मुताबिक, इंडस्ट्री में नए लोग आए हैं और काम करने का तरीका ज्यादा आधुनिक और कॉर्पोरेट हुआ है। प्रोजेक्ट्स को तय समय में पूरा करने पर भी पहले की तुलना में ज्यादा ध्यान दिया जाता है।
अभिनेता ने इसे फिल्म इंडस्ट्री के सकारात्मक बदलावों में शामिल किया। यानी उनकी शिकायत पूरी इंडस्ट्री की कार्यप्रणाली से नहीं, बल्कि मुख्य रूप से कहानी और किरदारों में दिखाई देने वाली कमी से जुड़ी है।
क्यों जरूरी हैं यादगार किरदार?
अखिलेंद्र मिश्रा की बातों का मूल सवाल यही है कि क्या आज की फिल्मों में ऐसे किरदार लिखे जा रहे हैं, जिन्हें दर्शक फिल्म खत्म होने के बाद भी याद रखें?
आज फिल्मों और ओटीटी की संख्या लगातार बढ़ रही है। दर्शकों के पास कंटेंट के विकल्प भी पहले से कहीं ज्यादा हैं। ऐसे समय में किसी किरदार की अलग पहचान ही उसे भीड़ से अलग कर सकती है।
अखिलेंद्र मिश्रा के मुताबिक, मजबूत लेखन, अलग व्यक्तित्व, प्रभावशाली संवाद और स्वाभाविक अभिनय मिलकर किसी किरदार को यादगार बनाते हैं। यही वजह है कि पुराने दौर के कई सहायक और नकारात्मक किरदार आज भी दर्शकों की बातचीत का हिस्सा बने हुए हैं।
अखिलेंद्र मिश्रा ने हिंदी सिनेमा की मौजूदा स्थिति पर सवाल उठाते हुए कहा है कि फिल्मों को फिर से ऐसे किरदारों की जरूरत है, जिनकी अपनी अलग पहचान और व्यक्तित्व हो। हालांकि उन्होंने इंडस्ट्री के आधुनिक और व्यवस्थित होने की तारीफ भी की।
अब देखने वाली बात यह होगी कि आने वाले दौर का हिंदी सिनेमा क्या ऐसे नए किरदार दर्शकों को दे पाता है, जो ‘क्रूर सिंह’, ‘मिर्ची सेठ’ और पुराने दौर के दूसरे यादगार पात्रों की तरह लंबे समय तक लोगों की यादों में बने रहें।


