Awarapan 2 Movie Review: साल 2007 में रिलीज हुई इमरान हाशमी की ‘आवारापन’ उन फिल्मों में शामिल है, जिसे रिलीज के समय से ज्यादा प्यार बाद के वर्षों में मिला। फिल्म के किरदार, कहानी, इमोशन और संगीत ने इसे धीरे-धीरे एक कल्ट फिल्म की पहचान दिलाई। ऐसे में करीब 19 साल बाद जब ‘आवारापन 2’ का ऐलान हुआ, तो इमरान हाशमी के फैंस के बीच उत्साह स्वाभाविक था।
14 अगस्त 2026 को रिलीज हुई इस फिल्म में इमरान हाशमी एक बार फिर शिवम पंडित के किरदार में नजर आए हैं। उनके साथ दिशा पाटनी, शबाना आजमी, श्रिया सरन, पूरन गब्बी और सुविंदर विक्की जैसे कलाकार हैं। फिल्म का निर्देशन नितिन कक्कड़ ने किया है और कहानी विशेष भट्ट, बिलाल सिद्दीकी और नितिन कक्कड़ ने लिखी है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या इतने लंबे इंतजार के बाद आई यह फिल्म पहले भाग की यादें ताजा कर पाती है? मौजूदा समीक्षा के आधार पर जवाब काफी निराशाजनक नजर आता है।
कहानी में क्या है?
फिल्म की कहानी शिवम पंडित से शुरू होती है। कहानी के मुताबिक बैंकॉक में गोली लगने के बाद भी शिवम जिंदा बच जाता है और भारत लौटकर छिपकर रहने लगता है।
एक दिन उसे कब्रिस्तान में एक बच्ची मिलती है। शिवम बच्ची को अनाथालय पहुंचाता है और उसका नाम आलिया रखता है। बाद में एक दंपती आलिया को गोद ले लेता है, लेकिन कहानी तब गंभीर मोड़ लेती है जब पता चलता है कि वह दंपती मानव तस्करी के एक गिरोह से जुड़ा हुआ था।
आलिया को बेचने के बाद उस दंपती की मौत हो जाती है। इसके बाद शिवम बच्ची को बचाने के लिए एक बार फिर बैंकॉक पहुंचता है। यहां उसे इंटरपोल से जुड़े एक व्यक्ति की मदद मिलती है।
आलिया की तलाश में शिवम जोरावर की गैंग का हिस्सा बन जाता है। जोरावर की दुश्मनी नफीसा से है और इसी संघर्ष के बीच शिवम की मुलाकात जोरावर की बहन जारा से होती है। दोनों के बीच भावनात्मक रिश्ता भी विकसित होता है।
अब क्या शिवम आलिया को खोज पाएगा? क्या वह उसे मानव तस्करी के जाल से बाहर निकाल सकेगा? फिल्म की कहानी इसी मिशन और उसके बीच पैदा होने वाले संघर्ष के इर्द-गिर्द घूमती है।

इमरान हाशमी पर टिकी पूरी फिल्म
‘आवारापन 2’ की सबसे बड़ी जिम्मेदारी इमरान हाशमी के कंधों पर है। शिवम पंडित का किरदार फिल्म का केंद्र है और इमरान पूरी कोशिश करते दिखाई देते हैं कि किरदार में जान डाल सकें।
हालांकि, समीक्षा के मुताबिक इंटरवल के बाद उनका किरदार काफी कमजोर पड़ जाता है। शिवम को लगातार संघर्ष करते और मार खाते हुए दिखाया गया है, जिससे उसके किरदार का प्रभाव पहले भाग की तुलना में कम महसूस होता है।
कुछ दृश्यों में इमरान का पुराना अंदाज जरूर दिखाई देता है, लेकिन पूरी फिल्म में वह प्रभाव लगातार कायम नहीं रह पाता।
दिशा पाटनी और शबाना आजमी से निराशा
दिशा पाटनी फिल्म में जारा की भूमिका निभाती हैं। उनके किरदार को कहानी में अपेक्षित स्पेस नहीं मिलता। संवाद भी काफी सीमित हैं। ऐसे में उनकी मौजूदगी फिल्म में बहुत प्रभावशाली नहीं बन पाती।
वहीं शबाना आजमी को लेकर शुरुआत में काफी उम्मीद जगाई जाती है। उनका किरदार कहानी में एक मजबूत प्रतिद्वंद्वी के तौर पर सामने आने की उम्मीद पैदा करता है, लेकिन स्क्रीन स्पेस सीमित होने के कारण उनका प्रभाव कम हो जाता है।
विलेन कितना असरदार?
पूरन गब्बी जोरावर के किरदार में नजर आते हैं। उनका किरदार लगातार आक्रामक और सनकी अंदाज में दिखाई देता है, लेकिन समीक्षा के मुताबिक वह ऐसा खौफ पैदा नहीं कर पाते, जिसकी एक बड़े विलेन से उम्मीद होती है।
यही वजह है कि फिल्म देखते हुए दर्शकों को पहले भाग के प्रभावशाली खलनायकों की याद आ सकती है। जोरावर का किरदार कई जगह गंभीर होने के बजाय कुछ हद तक बचकाना महसूस होता है।
निर्देशन और कहानी सबसे कमजोर कड़ी
फिल्म की सबसे बड़ी समस्या इसकी पटकथा और निर्देशन बताई जा रही है। तीन लेखकों के बावजूद कहानी में वह कसाव नजर नहीं आता, जो एक सीक्वल के लिए जरूरी होता है।
निर्देशक नितिन कक्कड़ कई जगह पहले भाग की यादों पर निर्भर दिखाई देते हैं। पुराने संदर्भ, बैकग्राउंड म्यूजिक और कैमियो के जरिए ‘आवारापन’ की पुरानी यादों को जगाने की कोशिश की गई है।
लेकिन सिर्फ पुराने किरदारों या यादों का इस्तेमाल किसी नई कहानी को मजबूत नहीं बना सकता। यही समस्या फिल्म के क्लाइमैक्स में भी नजर आती है। कहानी जिस बड़े संघर्ष की ओर बढ़ती है, उसका समाधान उतना प्रभावी नहीं लगता।
फर्स्ट हाफ से सेकेंड हाफ तक धीमी रफ्तार
फिल्म की शुरुआत उम्मीद जगाती है, लेकिन आगे बढ़ते-बढ़ते इसकी रफ्तार कमजोर पड़ती जाती है। बार-बार आने वाले गाने और इमोशनल सीक्वेंस कहानी की गति को प्रभावित करते हैं।
इंटरवल के बाद भी फिल्म अपेक्षित तेजी नहीं पकड़ पाती। एक्शन और ड्रामा होने के बावजूद कहानी में वह तनाव पैदा नहीं होता, जो दर्शक को लगातार स्क्रीन से बांधे रखे।
म्यूजिक देता है थोड़ी राहत
‘आवारापन’ की सबसे बड़ी ताकतों में उसका संगीत भी शामिल था। सीक्वल में पुराने संगीत की याद जरूर आती है, लेकिन नए गाने उस स्तर की छाप छोड़ते नजर नहीं आते।
‘वे जुनून’ को छोड़ दें तो फिल्म का संगीत लंबे समय तक याद रहने वाला प्रभाव पैदा नहीं करता। पुराने गीतों की भावनात्मक यादें ही कई जगह फिल्म को संभालती हैं।
Awarapan 2 देखें या नहीं?
अगर आप इमरान हाशमी के जबरदस्त फैन हैं और 2007 वाली ‘आवारापन’ से खास लगाव रखते हैं, तो फिल्म को एक बार देखने की कोशिश कर सकते हैं। लेकिन अगर आप पहले भाग जैसी मजबूत कहानी, गहरे किरदार और यादगार रोमांच की उम्मीद लेकर सिनेमाघर जा रहे हैं, तो निराशा हो सकती है।
Rating
Awarapan 2 Rating: 2/5
फिल्म में इमरान हाशमी की मौजूदगी और कुछ भावनात्मक पल जरूर हैं, लेकिन कमजोर पटकथा, धीमी रफ्तार, सीमित किरदार और प्रभावहीन विलेन इसे पहले भाग के स्तर तक पहुंचने से रोक देते हैं।
‘आवारापन 2’ सबसे बड़ी चुनौती अपनी ही पिछली फिल्म की विरासत के कारण झेलती है। 19 साल बाद शिवम पंडित की वापसी से उम्मीदें बहुत थीं, लेकिन सीक्वल उस भावनात्मक गहराई और कहानी की मजबूती को दोहराने में कमजोर पड़ता है। इमरान हाशमी कोशिश करते हैं, संगीत कभी-कभार पुरानी यादें ताजा करता है, लेकिन कमजोर स्क्रीनप्ले और धीमी कहानी फिल्म का असर कम कर देती है। हमारी रेटिंग: 2/5।


