in

स्टारडम का जलवा पड़ा फीका, छोटी फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर मचा दी हलचल; कहानी ने बदल दिया दर्शकों का मूड!

मुंबई: हिंदी सिनेमा में इन दिनों बॉक्स ऑफिस पर एक ऐसा ट्रेंड दिखाई दे रहा है, जिसने फिल्म इंडस्ट्री की पुरानी सोच पर बहस तेज कर दी है। सवाल यह है कि क्या अब किसी फिल्म की सफलता की गारंटी सिर्फ बड़ा स्टार, बड़ा बजट और भव्य प्रमोशन नहीं रह गई है? हाल के दिनों में कुछ बड़े सितारों और बड़े बजट वाली फिल्मों के उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं करने के बीच कम बजट या बिना स्थापित सुपरस्टार वाली फिल्मों ने दर्शकों के बीच अपनी जगह बनाई है। इससे ‘कंटेंट बनाम स्टार पावर’ की बहस फिर चर्चा में आ गई है।

‘अल्फा’, ‘टॉक्सिक’, ‘हैवान’, ‘ओ रोमियो’, ‘धमाल 4’ और ‘कॉकटेल 2’ जैसी फिल्मों को लेकर दर्शकों और ट्रेड में चर्चा रही, वहीं ‘मैं वापस आऊंगा’, ‘हॉन्टेड 3डी: इकोज ऑफ द पास्ट’, ‘हनुमान अंश’, ‘आवारापन 2’, ‘कृष्णावतारम पार्ट 1’ और ‘मिर्जापुर: द मूवी’ जैसी फिल्मों ने भी दर्शकों का ध्यान खींचा। इन फिल्मों के प्रदर्शन ने यह सवाल खड़ा किया कि क्या दर्शक अब फिल्म चुनते समय स्टार से ज्यादा कहानी और कंटेंट को प्राथमिकता दे रहे हैं?

दर्शक सिर्फ स्टार के नाम पर नहीं जा रहे?

ट्रेड एनालिस्ट तरण आदर्श के मुताबिक दर्शक हमेशा से समझदार रहे हैं और उन्हें कमतर आंकना सही नहीं है। उनके अनुसार समय के साथ सिनेमा बदलता रहता है और दर्शक भी फिल्मकारों को अपने तरीके से संकेत देते रहते हैं कि उन्हें किस तरह की कहानियां पसंद आ रही हैं।

उनके मुताबिक ‘हनुमान अंश’ और ‘मिर्जापुर: द मूवी’ जैसी फिल्मों का दर्शकों तक पहुंचना इस बात की ओर इशारा करता है कि सिनेमाघरों में जाने के लिए दर्शकों के लिए केवल किसी बड़े सुपरस्टार का नाम ही पर्याप्त नहीं है।

वहीं ‘हैवान’ जैसी फिल्म के अपेक्षित प्रदर्शन न करने को लेकर भी यही सवाल उठता है कि क्या किसी अभिनेता की पिछली सफलता अगली फिल्म की सफलता की गारंटी बन सकती है? विशेषज्ञों के मुताबिक ऐसा जरूरी नहीं है। दर्शक हर फिल्म को उसके कंटेंट और मनोरंजन के आधार पर अलग-अलग तरीके से स्वीकार कर सकते हैं।

छोटी फिल्मों के लिए खुल रहे नए रास्ते

फिल्ममेकर सुनील दर्शन का मानना है कि अलग-अलग बजट और विषयों वाली फिल्मों का सफल होना सिनेमा के लिए विविधता लेकर आता है। उनके मुताबिक पिछले साल ‘सैयारा’ और ‘महावतार नरसिम्हा’ जैसी फिल्मों की सफलता ने भी दिखाया कि दर्शक अलग तरह की कहानियों को स्वीकार कर सकते हैं।

हालांकि, उनका यह भी मानना है कि कई बार बड़े सितारे अपनी फिल्मों की सफलता को लेकर जरूरत से ज्यादा भरोसा कर लेते हैं। फिल्म किसी अभिनेता के नाम से शुरुआत में दर्शक जुटा सकती है, लेकिन लंबे समय तक उसे चलाने के लिए कहानी और प्रस्तुति महत्वपूर्ण हो जाती है।

सिनेमा के इतिहास में भी ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं जब एक ही दौर में किसी बड़े अभिनेता की एक फिल्म सफल हुई और दूसरी फिल्म उम्मीद के मुताबिक नहीं चली। इसका मतलब यह है कि स्टार पावर फिल्म को शुरुआती ध्यान जरूर दिला सकती है, लेकिन अंतिम फैसला दर्शक ही करते हैं।

क्या OTT ने बदल दिया दर्शकों का नजरिया?

फिल्म इंडस्ट्री में ओटीटी और इंटरनेट मीडिया के विस्तार ने भी दर्शकों की पसंद को प्रभावित किया है। अब दर्शकों के पास घर बैठे अलग-अलग भाषाओं और देशों का कंटेंट देखने के विकल्प मौजूद हैं। ऐसे में उन्हें सिर्फ बड़े पर्दे पर उपलब्ध मनोरंजन तक सीमित नहीं रहना पड़ता।

इस बदलाव ने फिल्मकारों के सामने चुनौती भी बढ़ाई है। दर्शक अब कहानी, स्क्रीनप्ले, विजुअल क्वालिटी, संगीत और निर्देशन की तुलना पहले से ज्यादा आसानी से कर सकते हैं।

फिल्ममेकर सुनील दर्शन के मुताबिक अगर किसी फिल्म का कंटेंट मजबूत है तो वह अपनी पहचान बनाने की क्षमता रखता है। हालांकि, अच्छी फिल्म को पर्याप्त स्क्रीन और दर्शकों तक पहुंच न मिलने पर शुरुआती नुकसान हो सकता है।

स्टारडम का जलवा पड़ा फीका, छोटी फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर मचा दी हलचल; कहानी ने बदल दिया दर्शकों का मूड!
स्टारडम का जलवा पड़ा फीका, छोटी फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर मचा दी हलचल; कहानी ने बदल दिया दर्शकों का मूड!

सोशल मीडिया और माउथ पब्लिसिटी की बढ़ती ताकत

निर्माता विनोद बच्चन के मुताबिक आज के दौर में माउथ पब्लिसिटी किसी फिल्म के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो गई है। उनका मानना है कि ‘आवारापन 2’ जैसी फिल्मों के मामले में कंटेंट और संगीत ने दर्शकों के बीच चर्चा बनाने में भूमिका निभाई।

उनके अनुसार आज यह जरूरी नहीं कि किसी फिल्म को बड़े पैमाने पर रिलीज करने से वह तुरंत बड़ी कमाई करने लगे। कई बार फिल्म धीरे-धीरे दर्शकों के बीच अपनी जगह बनाती है। सोशल मीडिया पर चर्चा, दर्शकों की प्रतिक्रियाएं और दोस्तों-परिवार के बीच बातचीत किसी फिल्म को आगे बढ़ा सकती है।

‘हनुमान अंश’ को लेकर भी यही बात सामने रखी गई कि शुरुआती दौर में फिल्म की चर्चा सीमित रही, लेकिन बाद में वर्ड ऑफ माउथ के जरिए दर्शकों की दिलचस्पी बढ़ी।

बड़ी फिल्में क्यों चूक जाती हैं?

बड़े बजट वाली फिल्मों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि उनसे दर्शकों की उम्मीद भी बड़ी होती है। जब किसी फिल्म से पहले ही बहुत ज्यादा उम्मीदें जुड़ जाती हैं, तो कहानी या प्रस्तुति उन उम्मीदों पर खरी न उतरने पर प्रतिक्रिया भी तेज हो सकती है।

निर्माता विनोद बच्चन के मुताबिक कोई भी निर्माता या निर्देशक जानबूझकर खराब फिल्म बनाने के इरादे से काम नहीं करता। हर फिल्म के पीछे उसे सफल बनाने की कोशिश होती है, लेकिन कभी-कभी फिल्मकारों का आकलन दर्शकों की पसंद से मेल नहीं खाता।

इसके अलावा फिल्म की रिलीज टाइमिंग भी महत्वपूर्ण होती है। त्योहार, प्रतियोगी फिल्में, दर्शकों का मूड और उस समय उपलब्ध कंटेंट—ये सभी किसी फिल्म के प्रदर्शन को प्रभावित कर सकते हैं।

अब बॉक्स ऑफिस का असली फैसला कौन करता है?

इस पूरी बहस का सबसे अहम पहलू यही है कि सिनेमा में कोई एक फॉर्मूला हमेशा काम नहीं करता। कभी बड़े स्टार की फिल्म जबरदस्त सफलता हासिल करती है तो कभी बिना बड़े चेहरे वाली फिल्म दर्शकों के बीच अप्रत्याशित लोकप्रियता हासिल कर लेती है।

यही वजह है कि ‘कंटेंट इज किंग’ की चर्चा फिर जोर पकड़ रही है। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं कि स्टार पावर खत्म हो गई है। बड़े कलाकार आज भी दर्शकों को सिनेमाघरों तक लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। फर्क इतना है कि अब दर्शक फिल्म देखने के बाद अपनी प्रतिक्रिया तेजी से साझा करते हैं और वही प्रतिक्रिया आगे चलकर फिल्म की कमाई और चर्चा को प्रभावित कर सकती है।

News Desk

Written by News Desk

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

चुनाव से पहले BJP का पंजाब में बड़ा दांव, नितिन नवीन आज पठानकोट से शुरू करेंगे ‘नशामुक्त पंजाब यात्रा’; 117 सीटों तक पहुंचेगा अभियान

सेवा संकल्प अभियान

सेवा संकल्प अभियान : नवयुग कन्या महाविद्यालय में गूंजा ‘सेवा संकल्प’: दीप प्रज्ज्वलन और टैलेंट हंट में छात्राओं ने दिखाया हुनर