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बच्चों के साहित्य पर भोपाल में उठी बड़ी आवाज, ‘एक पेड़ की कथा’ के विमोचन में बोले रघुनंदन शर्मा- अब ज्यादा लिखना जरूरी

भोपाल: बच्चों के लिए गुणवत्तापूर्ण और उपयोगी साहित्य का लगातार सृजन आज के समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता बन गया है। बच्चों के बदलते परिवेश, प्रकृति से बढ़ती दूरी और बचपन के सामने खड़ी नई चुनौतियों के बीच साहित्य की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। इसी मुद्दे को लेकर भोपाल में आयोजित एक साहित्यिक कार्यक्रम में साहित्यकारों और शिक्षाविदों ने गंभीर विचार साझा किए।

कार्यक्रम के दौरान सुपरिचित लेखक और रंगकर्मी संजय मेहता की पुस्तक ‘एक पेड़ की कथा’ का लोकार्पण किया गया। इस अवसर पर मानस प्रतिष्ठान के कार्यकारी अध्यक्ष एवं विचारक रघुनंदन शर्मा ने बच्चों के लिए अधिकाधिक और गुणवत्तापूर्ण साहित्य लिखे जाने की आवश्यकता पर जोर दिया।

बच्चों के साहित्य को प्रोत्साहन देने की जरूरत

रघुनंदन शर्मा ने कहा कि वर्तमान समय में बच्चों के साहित्य की कमी महसूस की जा रही है। ऐसे में रचनाकारों को बच्चों के लिए ज्यादा से ज्यादा साहित्य सृजन के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि बाल साहित्य केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं है, बल्कि यह बच्चों के व्यक्तित्व, सोच और सामाजिक चेतना के विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

उन्होंने संजय मेहता की पुस्तक ‘एक पेड़ की कथा’ का उल्लेख करते हुए कहा कि यह रचना पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ किसान की कथा और उसकी व्यथा को भी प्रभावी ढंग से सामने रखती है।

पर्यावरण से बच्चों को जोड़ सकती है कहानी

रघुनंदन शर्मा के मुताबिक बच्चों को प्रकृति और पर्यावरण के करीब लाने में साहित्य महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। पेड़, प्रकृति और पर्यावरण जैसे विषय बच्चों के भीतर संवेदनशीलता विकसित करने के साथ उन्हें अपने आसपास की दुनिया को समझने का अवसर देते हैं।

‘एक पेड़ की कथा’ इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण मानी गई, क्योंकि पुस्तक के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण और किसान जीवन से जुड़े मुद्दों को कहानी के रूप में सामने रखा गया है।

लेखक संजय मेहता ने साझा किया लेखन का अनुभव

कार्यक्रम की शुरुआत में लेखक संजय मेहता ने अपनी लेखन यात्रा के अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि ‘एक पेड़ की कथा’ उनकी छठवीं पुस्तक है।

संजय मेहता ने कहा कि बच्चों के लिए लिखना उनके लिए विशेष रुचि का विषय है और भविष्य में भी वे बच्चों के लिए अधिक से अधिक साहित्य लिखना चाहते हैं।

उनके मुताबिक बाल साहित्य के माध्यम से बच्चों के साथ गंभीर सामाजिक और पर्यावरणीय विषयों को सरल एवं प्रभावी तरीके से जोड़ा जा सकता है।

‘बच्चों के लिए लिखें बड़े लेखक’

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे भारतीय जन संचार संस्थान (आईआईएमसी) के पूर्व महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदी ने बाल साहित्य की स्थिति को लेकर महत्वपूर्ण बात कही।

उन्होंने कहा कि हिंदी में बच्चों के लिए लेखन करने वाले रचनाकारों को अपेक्षित रूप से लेखक का दर्जा नहीं दिया जाता। इसके विपरीत कई अन्य भारतीय भाषाओं में साहित्यिक लेखन की शुरुआत बाल साहित्य से होती है।

प्रो. संजय द्विवेदी ने वर्तमान समय में बच्चों के सामने मौजूद चुनौतियों और बचपन के संकटों पर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि बदलते सामाजिक परिवेश में बच्चों के लिए संवेदनशील और सार्थक साहित्य की जरूरत और बढ़ गई है।

रंगमंच से संदेश को बनाया जा सकता है प्रभावी

विशिष्ट अतिथि साहित्यकार एवं शिक्षाविद् डॉ. संतोष चौबे ने साहित्य और रंगमंच के संबंध पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में अधिकाधिक साहित्यिक कहानियों का रूपांतरण किया जाना चाहिए।

उन्होंने नाटकों के व्यापक स्तर पर मंचन की आवश्यकता बताते हुए कहा कि रंगमंच सामाजिक संदेश को प्रभावी तरीके से जन-जन तक पहुंचाने का सशक्त माध्यम है।

उनके अनुसार साहित्यिक रचनाओं को मंच पर लाने से उनकी पहुंच केवल पाठकों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि व्यापक समाज तक संदेश पहुंचाने का अवसर मिलता है।

पर्यावरण संरक्षण को लेकर जताई चिंता

सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता एवं विशिष्ट अतिथि गुंजन चौकसे ने पर्यावरण संरक्षण को गंभीर चिंता का विषय बताया।

उन्होंने कहा कि जब बच्चे पर्यावरण संरक्षण जैसी चिंताओं से जुड़ते हैं तो इसका सकारात्मक प्रभाव पूरे समाज पर पड़ता है। बच्चों को प्रकृति के प्रति संवेदनशील बनाना भविष्य के लिए महत्वपूर्ण है।

‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ विशेषांक का भी विमोचन

कार्यक्रम में केवल पुस्तक विमोचन ही नहीं, बल्कि अन्य साहित्यिक गतिविधियां भी आयोजित की गईं। इस अवसर पर अनुसंधान पत्रिका ‘समागम’ के विशेषांक ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ का विमोचन किया गया।

कार्यक्रम के दौरान लेखकों का सम्मान भी किया गया। साथ ही ‘समागम गुरुकुल’ का पोस्टर जारी किया गया।

कार्यक्रम का संचालन समागम के संपादक प्रो. मनोज कुमार ने किया।

साहित्य, रंगमंच और पत्रकारिता से जुड़े लोग हुए शामिल

कार्यक्रम में मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के निदेशक डॉ. विकास दवे सहित साहित्य, रंगमंच और पत्रकारिता से जुड़े अनेक प्रमुख लोग मौजूद रहे।

पूरे कार्यक्रम में बच्चों के साहित्य, पर्यावरण संरक्षण, रंगमंच और सामाजिक सरोकारों से जुड़े विषय प्रमुखता से सामने आए। वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि बच्चों के लिए लिखा जाने वाला साहित्य केवल मनोरंजन तक सीमित न रहे, बल्कि उसमें प्रकृति, समाज और जीवन के महत्वपूर्ण पक्षों को भी प्रभावी ढंग से शामिल किया जाए।

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