आचार्य: संजय तिवारी ने कुत्तों को लेकर कोर्ट में चल रही सुनवाई के बहाने इंसान और प्रकृति के रिश्ते पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि विधाता ने पृथ्वी और सृष्टि को संतुलन के लिए रचा, लेकिन इंसान ने अपनी सुविधाओं के लिए इस संतुलन को तोड़ दिया। नदियों, पहाड़ों, जंगलों और जीव-जंतुओं तक को इंसान ने अपने उपयोग की वस्तु बना लिया, जिससे कई प्रजातियां विलुप्त होने के कगार पर पहुंच गईं।
आवारा सिर्फ कुत्ते नहीं, प्रकृति के अन्य रूप भी
आचार्य तिवारी का तर्क है कि हम केवल कुत्तों को ‘आवारा’ कहकर पुकारते हैं, लेकिन यदि इसी तर्क से देखें तो पवन, जल, आकाश, अग्नि जैसे प्रकृति के तत्व भी “आवारा” कहे जा सकते हैं, क्योंकि इन पर कोई कानून लागू नहीं होता। वे तंज कसते हैं कि जैसे कुत्तों को कोर्ट में घसीटा जा रहा है, वैसे ही बादलों, नदियों, समुद्र और तूफानों को भी अदालत में पेश करना चाहिए।
कुत्ता—इंसान का पुराना साथी
इतिहास और संस्कृति में कुत्ता इंसान का सबसे नजदीकी साथी रहा है। पांडवों की कथा में युधिष्ठिर एक कुत्ते को साथ लेकर स्वर्ग गए, और 1957 में सोवियत रूस ने ‘लाइका’ नामक आवारा कुत्ते को अंतरिक्ष में भेजा। गांवों में परंपरा थी कि पहली रोटी अग्नि के लिए, दूसरी गाय के लिए और आखिरी कुत्ते के लिए रखी जाती थी। लेकिन शहरीकरण और सामाजिक बदलाव के चलते यह रिश्ता कमजोर हो गया।
समाज हिंसक, तो जानवर भी हिंसक
आचार्य तिवारी का कहना है कि समस्या सिर्फ कुत्तों की नहीं, बल्कि समाज की है। जैसा समाज होगा, वैसे ही जानवर भी होंगे। आज का समाज हिंसक है, इसलिए जानवरों में भी हिंसक प्रवृत्तियां देखने को मिल रही हैं। रणथंभोर के बाघ फोटो खिंचवाने के लिए पोज देते हैं, लेकिन जब सरल जीव जैसे गाय या कुत्ता थोड़ा हिंसक होते हैं तो हम उन्हें दुश्मन मान लेते हैं।
बड़ा सवाल: असली हिंसक कौन?
लेख का निष्कर्ष यह है कि असली हिंसक इंसान है, जो स्वयं को प्रकृति का मालिक मान बैठा है। आचार्य तिवारी सवाल करते हैं—क्या हम आने वाले समय में बादलों, नदियों, समुद्र, बिजली, चक्रवात और तूफानों को भी कोर्ट में घसीटेंगे? डर हमें इन सभी से है, लेकिन दोषारोपण हम सबसे कमजोर कड़ी—जानवरों—पर करते हैं।


